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परमाणु त्रयी की ओर मजबूत होते भारत के कदम

A new assessment in the Bulletin of the Atomic Scientists estimates India’s nuclear arsenal at up to about 190 warheads—an open-source figure, not an official Indian declaration. The more significant development is the evolving structure of India’s deterrent. India now operates nine nuclear-capable delivery systems and is advancing toward a full nuclear triad of aircraft, land-based missiles and sea-based ballistic missiles, enhancing second-strike credibility. Key advances include the Agni-5 with MIRV technology and canisterised, road-mobile systems. While earlier debates focused mainly on Pakistan, longer-range systems increasingly address China. India continues to uphold a doctrine of credible minimum deterrence and no-first-use, underscoring that survivable capability and restraint remain more important than raw numbers.

190 परमाणु हथियारों का अनुमान, लेकिन संख्या से अधिक महत्वपूर्ण है बदलती सामरिक क्षमता

जयसिंह रावत-

दुनिया में परमाणु हथियारों की होड़ समाप्त होने के बजाय नए तकनीकी दौर में प्रवेश करती दिखाई दे रही है। रूस और अमेरिका के विशाल परमाणु भंडार के बीच चीन तेजी से अपनी क्षमता बढ़ा रहा है और दक्षिण एशिया में भारत तथा पाकिस्तान भी अपने परमाणु प्रतिरोध को आधुनिक बना रहे हैं। इसी पृष्ठभूमि में भारत के परमाणु हथियारों पर आया नया अंतरराष्ट्रीय आकलन विशेष महत्व रखता है। बुलेटिन ऑफ द एटॉमिक साइंटिस्ट्स में प्रकाशित ‘इंडियन न्यूक्लियर वेपन्स, 2026’ के अनुसार भारत के परमाणु हथियारों की संख्या अब अधिकतम करीब 190 हो सकती है। यह किसी भारतीय सरकारी एजेंसी का घोषित आंकड़ा नहीं, बल्कि उपलब्ध सूचनाओं के आधार पर किया गया विशेषज्ञ आकलन है।

190 का आंकड़ा कितना विश्वसनीय

भारत अपने परमाणु हथियारों की संख्या सार्वजनिक नहीं करता। इसलिए किसी भी विदेशी संस्था द्वारा बताई गई संख्या को आधिकारिक तथ्य मानने के बजाय अनुमान के रूप में ही देखा जाना चाहिए। अध्ययन तैयार करने वाले फेडरेशन ऑफ अमेरिकन साइंटिस्ट्स के विशेषज्ञों ने सरकारी वक्तव्यों, सार्वजनिक और पुराने गोपनीय दस्तावेजों, बजटीय सूचनाओं, रक्षा संबंधी प्रकाशनों तथा वाणिज्यिक उपग्रह चित्रों जैसे खुले स्रोतों का इस्तेमाल किया है। उनका अनुमान है कि भारत के परिचालन वितरण साधन 160 से अधिक परमाणु हथियार पहुंचाने में सक्षम हैं और निर्माणाधीन मिसाइलों के लिए तैयार अतिरिक्त हथियारों को मिलाकर कुल भंडार 190 तक पहुंच सकता है।

इस अनुमान को स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट यानी सिपरी का 2026 का आकलन भी व्यापक रूप से पुष्ट करता है। सिपरी ने जनवरी 2026 में भारत के पास करीब 190 और पाकिस्तान के पास करीब 170 परमाणु हथियार होने का अनुमान लगाया है। चीन का अनुमानित भंडार करीब 620 है। इसलिए भारत की परमाणु क्षमता को केवल पाकिस्तान के संदर्भ में देखने के बजाय चीन सहित व्यापक एशियाई सामरिक परिदृश्य में समझना जरूरी हो गया है।

संख्या नहीं, क्षमता में बड़ा बदलाव

नए अध्ययन का सबसे महत्वपूर्ण निष्कर्ष 190 की संख्या नहीं, बल्कि भारत के परमाणु प्रतिरोध की बदलती संरचना है। उसके अनुसार भारत फिलहाल नौ प्रकार की परमाणु-सक्षम प्रणालियां संचालित करता है—दो विमान आधारित, छह जमीन से छोड़ी जाने वाली बैलिस्टिक मिसाइल प्रणालियां और एक समुद्र आधारित बैलिस्टिक मिसाइल प्रणाली। कम से कम दो अन्य प्रणालियां विकास के उन्नत चरण में बताई गई हैं।

यही भारत को वास्तविक ‘परमाणु त्रयी’ की दिशा में आगे ले जाता है। परमाणु त्रयी का अर्थ है—विमान, जमीन आधारित मिसाइल और परमाणु पनडुब्बी, तीनों माध्यमों से जवाबी परमाणु हमला करने की क्षमता। इनमें समुद्र आधारित क्षमता विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। जमीन के मिसाइल ठिकानों और हवाई अड्डों को दुश्मन निशाना बना सकता है, लेकिन समुद्र की गहराइयों में मौजूद परमाणु पनडुब्बी को ढूंढ़ना और नष्ट करना कहीं कठिन है। इसीलिए पनडुब्बी आधारित हथियार किसी देश की ‘दूसरे प्रहार’ की क्षमता को अधिक विश्वसनीय बनाते हैं।

अग्नि-5 से नई तकनीकी छलांग

भारत की अग्नि मिसाइल शृंखला भी इस बदलाव के केंद्र में है। अग्नि-5 की मारक क्षमता भारत को अधिक दूरी पर स्थित सामरिक लक्ष्यों तक पहुंचने की क्षमता देती है। इससे भी महत्वपूर्ण एमआईआरवी तकनीक है, जिसमें एक ही मिसाइल कई पुनःप्रवेश वाहनों के जरिए अलग-अलग लक्ष्यों की ओर आयुध पहुंचा सकती है। मार्च 2024 में भारत ने ‘मिशन दिव्यास्त्र’ के तहत अग्नि-5 के साथ इस तकनीक का पहला घोषित परीक्षण किया था। मई 2026 में कई पेलोड के साथ एक और परीक्षण किए जाने का उल्लेख नए अध्ययन में है।

इस तकनीकी प्रगति का अर्थ केवल अधिक मारक क्षमता नहीं है। इससे भारत की प्रतिरोधक क्षमता अधिक जटिल और जीवित रहने योग्य बन सकती है। कनस्तर में रखी जाने वाली और सड़क से संचालित मिसाइलों के कारण प्रक्षेपण प्रणाली को स्थानांतरित करना संभव होता है और आवश्यकता पड़ने पर प्रतिक्रिया समय भी घट सकता है।

प्लूटोनियम क्षमता भी महत्वपूर्ण

एक अन्य महत्वपूर्ण पहलू विखंडनीय पदार्थों की उपलब्धता है। अध्ययन में अंतरराष्ट्रीय अनुमानों के आधार पर कहा गया है कि भारत ने 2026 के आरंभ तक लगभग 730 किलोग्राम, इसमें करीब 170 किलोग्राम कम या अधिक की अनिश्चितता के साथ, हथियार-स्तर का प्लूटोनियम तैयार किया हो सकता है। सैद्धांतिक रूप से यह लगभग 140 से 225 परमाणु हथियारों के लिए पर्याप्त हो सकता है। लेकिन इसका अर्थ यह कतई नहीं कि भारत के पास 225 हथियार मौजूद हैं। हथियार की डिजाइन, प्रत्येक में प्रयुक्त प्लूटोनियम और सुरक्षित रखे गए भंडार जैसी अनेक अनिश्चितताएं हैं।

यही अंतर समाचार और विश्लेषण में विशेष सावधानी मांगता है। ‘भारत के पास 190 परमाणु हथियार हैं’ कहने के बजाय ‘भारत के पास अधिकतम करीब 190 हथियार होने का अंतरराष्ट्रीय अनुमान है’ कहना अधिक तथ्यपरक होगा।

पाकिस्तान से आगे चीन का समीकरण

दशकों तक भारतीय परमाणु प्रतिरोध की चर्चा मुख्यतः पाकिस्तान के संदर्भ में होती रही, लेकिन लंबी दूरी की अग्नि मिसाइलों और समुद्र आधारित क्षमता के विस्तार से चीन का आयाम अधिक महत्वपूर्ण हो गया है। नए अध्ययन का भी आकलन है कि लंबी दूरी की भारतीय प्रणालियां भविष्य के सामरिक संतुलन में चीन को अधिक महत्व दिए जाने की ओर संकेत करती हैं।

यह बदलाव ऐसे समय हो रहा है जब चीन स्वयं अपने परमाणु भंडार का तेजी से आधुनिकीकरण और विस्तार कर रहा है। सिपरी के अनुसार 2026 के आरंभ में चीन का अनुमानित परमाणु भंडार करीब 620 हथियार था। दूसरी ओर पाकिस्तान भी अपनी परमाणु क्षमता बनाए हुए है। इस तरह भारत को दो परमाणु हथियार संपन्न पड़ोसियों के बीच अपनी प्रतिरोधक रणनीति बनानी पड़ती है।

भारत की नीति का मूल आधार

तकनीकी विस्तार के बावजूद भारत की घोषित परमाणु नीति का मूल सिद्धांत ‘विश्वसनीय न्यूनतम प्रतिरोध’ रहा है। जनवरी 2003 में मंत्रिमंडलीय सुरक्षा समिति द्वारा सार्वजनिक परमाणु सिद्धांत में ‘पहले प्रयोग नहीं’ की नीति दोहराई गई थी। इसके अनुसार भारत परमाणु हमला होने पर जवाबी परमाणु प्रहार करेगा और ऐसे जवाब का अधिकार नागरिक राजनीतिक नेतृत्व के अधीन परमाणु कमान प्राधिकरण के पास रहेगा। रासायनिक या जैविक हथियारों के बड़े हमले की स्थिति के लिए अलग अपवाद भी रखा गया था।

यही वह बिंदु है जहां भारत की बढ़ती तकनीकी क्षमता और उसकी घोषित नीति को साथ रखकर देखना चाहिए। अधिक सक्षम मिसाइल, पनडुब्बी या अतिरिक्त वारहेड अपने आप आक्रामक परमाणु नीति के प्रमाण नहीं हैं। प्रतिरोध का मूल उद्देश्य विरोधी को यह विश्वास दिलाना होता है कि प्रथम हमला करने के बावजूद वह विनाशकारी जवाब से बच नहीं सकेगा।

नई परमाणु दौड़ का खतरा

लेकिन व्यापक विश्व परिदृश्य चिंताजनक है। सिपरी के अनुसार 2026 की शुरुआत में नौ परमाणु हथियार संपन्न देशों के पास कुल करीब 12,187 परमाणु हथियार थे। अमेरिका और रूस अब भी विशाल बहुमत रखते हैं, लेकिन लगभग सभी परमाणु शक्तियां अपने शस्त्रागार का आधुनिकीकरण कर रही हैं। हथियार नियंत्रण की पुरानी व्यवस्थाओं के कमजोर होने से पारदर्शिता भी घट रही है।

इसलिए भारत के लिए असली चुनौती केवल हथियारों की संख्या बढ़ाना नहीं, बल्कि विश्वसनीय प्रतिरोध, सुरक्षित कमान, तकनीकी श्रेष्ठता और रणनीतिक संयम के बीच संतुलन बनाए रखना है। परमाणु शक्ति की सफलता इस बात में नहीं कि उसके पास कितने हथियार हैं, बल्कि इसमें है कि वे इतने विश्वसनीय हों कि उनका कभी इस्तेमाल करने की नौबत ही न आए। भारत के अनुमानित 190 परमाणु हथियारों से कहीं अधिक महत्वपूर्ण संदेश यही है कि उसकी परमाणु त्रयी अब धीरे-धीरे अधिक परिपक्व और सक्षम स्वरूप ग्रहण कर रही है।

About the Author : Jay Singh Rawat is a veteran journalist and author / editor of a dozen books. The facts and opinions expressed in this article do not necessarily reflect the views of the admin of this news portal.–Admin

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