गौचर में बंदर, लंगूर और सुअरों का आतंक, काश्तकार परेशान
–दिग्पाल गुसांई की रिपोर्ट-
गौचर, 20 अगस्त। अलग राज्य बने 26 साल पूरे होने को हैं, लेकिन पहाड़ी क्षेत्रों में बंदरों, लंगूरों और जंगली सुअरों की समस्या आज भी जस की तस बनी हुई है। चुनाव के समय जनता को इस समस्या से निजात दिलाने का भरोसा देने वाले जनप्रतिनिधियों के स्तर से ठोस पहल न होने से काश्तकारों में नाराजगी है। स्थिति यह है कि खेतों में दिन-रात मेहनत कर तैयार की गई फसल को बंदर, लंगूर और सुअर बर्बाद कर रहे हैं। इससे खेती लगातार घाटे का सौदा बनती जा रही है और काश्तकार खेती छोड़ने को मजबूर हो रहे हैं।
अलग राज्य बनने के बाद पहाड़ के लोगों को उम्मीद थी कि उनकी स्थानीय समस्याओं का प्राथमिकता के आधार पर समाधान होगा। लेकिन सरकार चाहे किसी भी दल की रही हो, पहाड़ में खेती और ग्रामीण अर्थव्यवस्था से जुड़ी इस गंभीर समस्या का स्थायी समाधान नहीं हो पाया। खेती पर लगातार बढ़ते वन्यजीवों के दबाव को भी पहाड़ से बढ़ते पलायन के प्रमुख कारणों में माना जा रहा है।
गौचर क्षेत्र में पिछले कई वर्षों से बंदरों और लंगूरों के आतंक से लोग परेशान हैं। अब जंगली सुअरों ने भी काश्तकारों की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। काश्तकार किसी तरह मेहनत कर खेतों में फसल तैयार करते हैं, लेकिन फसल पकने से पहले ही बंदर, लंगूर और सुअर उसे बर्बाद कर देते हैं। ग्रामीणों का कहना है कि अब बंदरों और लंगूरों का व्यवहार भी आक्रामक होता जा रहा है, जिससे खेतों में काम करने वाली महिलाओं, बुजुर्गों और बच्चों में भी भय बना रहता है।
इन दिनों क्षेत्र में बंदरों और सुअरों ने कई काश्तकारों की फसलों को भारी नुकसान पहुंचाया है। ग्रामीणों का कहना है कि चुनाव के दौरान बंदरों और लंगूरों से निजात दिलाने के वादे किए जाते रहे हैं, लेकिन चुनाव के बाद समस्या पर प्रभावी कार्रवाई नहीं हो पाती। निकाय चुनाव को लगभग दो वर्ष होने को हैं, इसके बावजूद गौचर क्षेत्र में बंदरों और लंगूरों की समस्या का कोई स्थायी समाधान सामने नहीं आया है।
सरकारों की ओर से समय-समय पर काश्तकारों की आय दोगुनी करने, बंदरों के बंध्याकरण और जंगली सुअरों को नियंत्रित करने के लिए विभिन्न घोषणाएं और आदेश किए गए। हालांकि स्थानीय लोगों का आरोप है कि इनका प्रभाव जमीन पर दिखाई नहीं दे रहा है। गौचर क्षेत्र में लंबे समय से बंदर और लंगूर जहां खेतों को नुकसान पहुंचा रहे हैं, वहीं घरों और दुकानों तक पहुंचकर सामान उठा ले जाते हैं। मौका मिलते ही झुंड के रूप में दुकानों और घरों में घुसने से व्यापारियों और आम लोगों को भी नुकसान उठाना पड़ रहा है।
समस्या से परेशान काश्तकारों ने अब वन विभाग और नगर पालिका का रुख करना शुरू कर दिया है। व्यापार संघ अध्यक्ष राकेश लिंगवाल का कहना है कि बंदरों और लंगूरों की समस्या को लेकर कई बार मुख्यमंत्री हेल्पलाइन में शिकायत की जा चुकी है, लेकिन अब तक कोई प्रभावी समाधान नहीं हुआ। उन्होंने कहा कि समस्या लगातार बढ़ रही है और इसका सीधा असर काश्तकारों तथा व्यापारियों पर पड़ रहा है।
कांग्रेस के पूर्व जिलाध्यक्ष मुकेश नेगी का कहना है कि वर्तमान सरकार को जनता की समस्याओं से कोई लेना-देना नहीं रह गया है। उन्होंने कहा कि चुनाव के समय बड़े-बड़े वादे किए जाते हैं, लेकिन चुनाव के बाद जनता की समस्याएं फिर उपेक्षित रह जाती हैं।
आदेश की अवधि बढ़ी, कार्रवाई का दावा
वन क्षेत्राधिकारी नवल किशोर नेगी ने बताया कि जंगली सुअरों को मारने संबंधी आदेश की प्रक्रिया को पहले की तुलना में सरल किया गया है। पहले आदेश डीएफओ कार्यालय से जारी होते थे और उनकी अवधि एक सप्ताह होती थी। बाद में रेंज कार्यालय को आदेश जारी करने के लिए अधिकृत किया गया। अब आदेश की अवधि बढ़ाकर एक माह कर दी गई है।
उन्होंने बताया कि बंदरों को पकड़ने के संबंध में वन विभाग ग्रामीण क्षेत्रों में लगातार कार्रवाई कर रहा है। शहरी क्षेत्रों में बंदरों से संबंधित कार्रवाई के अधिकार नगर निकायों के पास हैं। ऐसे में शहरी क्षेत्र में बंदरों की समस्या के समाधान के लिए संबंधित नगर निकाय को कार्रवाई करनी होती है।
स्थानीय लोगों का कहना है कि बंदर, लंगूर और जंगली सुअरों से फसलों को हो रहे नुकसान के कारण पहाड़ में खेती का संकट लगातार गहरा रहा है। उनका कहना है कि यदि समस्या का स्थायी और प्रभावी समाधान नहीं किया गया तो आने वाले समय में खेती छोड़ने वाले काश्तकारों की संख्या और बढ़ सकती है।
