प्रौद्योगिकी आधारित युद्ध राष्ट्रीय सुरक्षा को नए सिरे से परिभाषित कर रहा है
डॉ. जितेंद्र सिंह ने नागरिक नवाचार को सैन्य आवश्यकताओं के साथ और अधिक एकीकृत करने का आह्वान किया
डॉ. जितेंद्र सिंह ने राष्ट्रीय रक्षा महाविद्यालय में ‘विज्ञान और प्रौद्योगिकी का भविष्य और राष्ट्रीय सुरक्षा पर इसका प्रभाव’ विषय पर विशेष भाषण दिया
भारत की भविष्य की सुरक्षा संरचना कृत्रिम बुद्धिमत्ता, क्वांटम प्रौद्योगिकी, जैव प्रौद्योगिकी और अंतरिक्ष क्षमताओं द्वारा संचालित होगी: डॉ. जितेंद्र सिंह
केन्द्रीय राज्यमंत्री ने भारत के रक्षा आयातक से उभरते रक्षा निर्यातक के रूप में परिवर्तन का उल्लेख किया
डॉ. जितेंद्र सिंह ने राष्ट्रीय रक्षा महाविद्यालय (एनडीसी) में वरिष्ठ अधिकारियों और पाठ्यक्रम प्रतिभागियों को संबोधित करते हुए कहा कि उभरती सुरक्षा चुनौतियों का प्रभावी ढंग से जवाब देने और तेजी से जटिल होते वैश्विक वातावरण में अपने रणनीतिक हितों को सुरक्षित करने के लिए भारत को प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में अग्रणी रहना चाहिए।
“विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी का भविष्य और राष्ट्रीय सुरक्षा पर इसका प्रभाव” विषय पर विशेष संबोधन देते हुए केन्द्रीय राज्य मंत्री ने कहा कि यह विषय सैन्य प्रतिष्ठानों की सीमाओं से परे जाकर राष्ट्रों की सुरक्षा, समृद्धि और दृढ़ता का केंद्र बन गया है। उन्होंने कहा कि तकनीकी प्रगति राष्ट्रीय सुरक्षा के हर आयाम को बदल रही है, जिससे वैज्ञानिक नवाचार रणनीतिक तैयारियों का एक अनिवार्य घटक बन गया है।
उन्होंने युद्ध के बदलते स्वरूप का जिक्र करते हुए कहा कि आधुनिक संघर्षों का निर्धारण अब केवल शारीरिक बल के बजाय तकनीकी श्रेष्ठता से हो रहा है। विश्व भर में हाल के सैन्य अभियानों ने उन्नत प्रौद्योगिकियों, विशेष रूप से अंतरिक्ष, संचार, निगरानी, सटीक प्रणालियों और रणनीतिक निर्णय लेने के क्षेत्रों में, निर्णायक भूमिका को प्रदर्शित किया है। उन्होंने कहा कि भारत की बढ़ती स्वदेशी तकनीकी क्षमताओं ने देश की रक्षा तैयारियों को काफी मजबूत किया है और वैश्विक स्तर पर इसकी स्थिति को बढ़ाया है।
डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि पिछले एक दशक में रक्षा क्षेत्र में भारत ने उल्लेखनीय परिवर्तन देखा है, आयातित प्रणालियों पर निर्भरता से हटकर आत्मनिर्भरता और स्वदेशी नवाचार की ओर निरंतर प्रगति की है। उन्होंने बताया कि 2014 से रक्षा उत्पादन में लगभग 174 प्रतिशत की वृद्धि हुई है और यह लगभग 1.54 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गया है, जबकि रक्षा निर्यात में लगभग 34 गुना वृद्धि हुई है और यह 23,000 करोड़ रुपये से अधिक हो गया है। निजी उद्योग की बढ़ती भागीदारी इस परिवर्तन का एक प्रमुख चालक बनकर उभरी है, जिसमें भारत के रक्षा निर्यात में निजी क्षेत्र की महत्वपूर्ण हिस्सेदारी है।
केन्द्रीय राज्य मंत्री ने कहा कि रक्षा विनिर्माण क्षेत्र का बढ़ता विस्तार नवाचार, उद्यमिता और राष्ट्रीय सुरक्षा उद्देश्यों के बीच बढ़ते तालमेल को दर्शाता है। उन्होंने रक्षा उत्पादन और प्रौद्योगिकी विकास में लगे 16,000 से अधिक लघु एवं मध्यम उद्यमों (एमएसएमई) और सैकड़ों स्टार्टअप के योगदान का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि भारत का रक्षा क्षेत्र इस बात का एक सशक्त उदाहरण बनकर उभर रहा है कि कैसे रणनीतिक आवश्यकताएं एक साथ औद्योगिक विकास, तकनीकी उन्नति और आर्थिक विस्तार के अवसर पैदा कर सकती हैं।
भविष्य के सुरक्षा परिदृश्य को परिभाषित करने वाली प्रौद्योगिकियों की पहचान करते हुए, डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि आने वाले दशकों में उन्नत अंतरिक्ष-आधारित क्षमताओं के समर्थन से कृत्रिम बुद्धिमत्ता, क्वांटम प्रौद्योगिकी और जैव प्रौद्योगिकी का तीव्र एकीकरण देखने को मिलेगा। उन्होंने इन क्षेत्रों का अगली पीढ़ी के युद्ध, रणनीतिक प्रतिरोध और राष्ट्रीय लचीलेपन के प्रमुख चालक के रूप में वर्णन किया।
डॉ. जितेंद्र सिंह ने कृत्रिम बुद्धिमत्ता पर कहा कि भविष्य की सैन्य प्रणालियाँ तेजी से स्वायत्त प्लेटफार्मों, सटीक निगरानी, पूर्वानुमान विश्लेषण, संज्ञानात्मक युद्ध क्षमताओं और अति तीव्र निर्णय लेने वाले तंत्रों पर निर्भर करेंगी। उन्होंने कहा कि एआई और मशीन लर्निंग सैन्य प्रशिक्षण, रसद, परिचालन योजना और खतरे के आकलन में मौलिक परिवर्तन लाएंगे, जिससे गतिशील सुरक्षा परिवेश में त्वरित और अधिक सटीक प्रतिक्रियाएँ संभव हो सकेंगी।
उन्होंने क्वांटम प्रौद्योगिकियों का जिक्र करते हुए कहा कि क्वांटम सेंसिंग, क्वांटम संचार और क्वांटम क्रिप्टोग्राफी में हुई प्रगति वैश्विक स्तर पर रणनीतिक क्षमताओं को नया रूप देने के लिए तैयार डॉ. सिंह ने कहा कि भारत द्वारा 2023 में राष्ट्रीय क्वांटम मिशन का शुभारंभ सुरक्षित संचार और उन्नत कंप्यूटिंग की अगली पीढ़ी को आकार देने वाले अग्रणी देशों में बने रहने के देश के दृढ़ संकल्प को दर्शाता है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि आने वाले वर्षों में महत्वपूर्ण राष्ट्रीय और सैन्य अवसंरचनाओं की सुरक्षा के लिए क्वांटम-सुरक्षित नेटवर्क और पोस्ट-क्वांटम क्रिप्टोग्राफी की तीव्र तैनाती आवश्यक होगी।
केन्द्रीय राज्य मंत्री ने राष्ट्रीय सुरक्षा नियोजन में जैव प्रौद्योगिकी और सिंथेटिक जीव विज्ञान के बढ़ते महत्व का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि कृत्रिम रोगजनकों और उन्नत जैविक खतरों सहित उभरती जैव सुरक्षा चुनौतियां निरंतर वैज्ञानिक नवाचार और तैयारी की आवश्यकता को दर्शाती है। उन्होंने इस बात पर बल दिया कि जैव प्रौद्योगिकी में निवेश भविष्य के स्वास्थ्य और सुरक्षा जोखिमों के खिलाफ लचीलापन मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।
डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि भारत के भावी सुरक्षा ढांचे को तीन व्यापक प्राथमिकताओं पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए: पूर्वानुमानित और सक्रिय खतरे का प्रबंधन, डिजिटल और साइबर मोर्चों की मजबूत सुरक्षा, और रणनीतिक प्रौद्योगिकियों और आपूर्ति श्रृंखलाओं में आत्मनिर्भरता बढ़ाना। उन्होंने कहा कि उभरती प्रौद्योगिकियां गतिशील खतरे की पहचान, स्वायत्त प्रतिक्रिया प्रणालियों और उन्नत साइबर सुरक्षा तंत्रों को सक्षम बनाएंगी, जो परस्पर जुड़े विश्व में राष्ट्रीय हितों की रक्षा करने में सक्षम होंगे।
उन्होंने सरकारी संस्थानों, उद्योग जगत, शिक्षा जगत, स्टार्टअप और अनुसंधान संगठनों के बीच मजबूत सहयोग का आह्वान करते हुए कहा कि नवाचार को गति देने और वैज्ञानिक सफलताओं को व्यावहारिक समाधानों में बदलने के लिए सार्वजनिक-निजी भागीदारी महत्वपूर्ण होगी। डॉ. जितेंद्र सिंह ने इस बात पर जोर दिया कि तकनीकी लाभों को रणनीतिक क्षमताओं में परिवर्तित करने के लिए वैज्ञानिक खोजों का प्रयोगशालाओं से वास्तविक दुनिया के अनुप्रयोगों तक निर्बाध रूप से पहुंचना आवश्यक है।
उन्होंने कहा कि भारत की दीर्घकालिक शक्ति एक सशक्त नवाचार पारिस्थितिकी तंत्र के निर्माण की क्षमता पर निर्भर करेगी, जहां नागरिक वैज्ञानिक प्रगति और सैन्य आवश्यकताएं साथ-साथ विकसित हों। इस प्रकार का तालमेल न केवल राष्ट्रीय सुरक्षा को मजबूत करेगा, बल्कि एक अग्रणी प्रौद्योगिकी-संचालित अर्थव्यवस्था और उन्नत रणनीतिक प्रौद्योगिकियों में एक विश्वसनीय वैश्विक भागीदार के रूप में भारत की स्थिति को भी बढ़ाएगा।
डॉ. जितेंद्र सिंह ने भारत के सशस्त्र बलों के योगदान की सराहना करते हुए कहा कि न केवल संघर्ष के समय देश की रक्षा करने के लिए, बल्कि आपदाओं, आपात स्थितियों और मानवीय संकटों के दौरान उनकी अमूल्य सेवा के लिए भी देश अपने सैनिकों का ऋणी है। उन्होंने कहा कि सशस्त्र बलों का शांत और अक्सर अनदेखा योगदान राष्ट्रीय जीवन के ताने-बाने को मजबूत करता है और सेवा एवं बलिदान की भावना का उदाहरण प्रस्तुत करता है।
उनके संबोधन के बाद राष्ट्रीय रक्षा महाविद्यालय के वरिष्ठ अधिकारियों और पाठ्यक्रम प्रतिभागियों के साथ उभरती प्रौद्योगिकियों, नवाचार-आधारित सुरक्षा रणनीतियों और इक्कीसवीं सदी में राष्ट्रीय सुरक्षा के सामने आने वाली चुनौतियों पर एक संवादात्मक चर्चा हुई।




