रक्षाबंधन भी रहा है राजनीतिक संधि का प्रतीक

— गोविन्द प्रसाद बहुगुणा
रक्षाबंधन को सामान्यतः भाई-बहन के नैसर्गिक स्नेह, विश्वास और सुरक्षा के संकल्प के पर्व के रूप में देखा जाता है। भाई की कलाई पर बहन द्वारा बांधा गया रक्षा-सूत्र केवल एक धागा नहीं, बल्कि जीवनपर्यंत एक-दूसरे के सुख-दुख में साथ रहने की भावना का प्रतीक है। लेकिन इतिहास, पौराणिक आख्यानों और राजनीति को देखें तो रक्षा-सूत्र का एक दूसरा स्वरूप भी दिखाई देता है—जहां यह रक्त संबंध से आगे बढ़कर संरक्षण, सहायता, मित्रता और यहां तक कि राजनीतिक संधि का प्रतीक बन जाता है।
इस अर्थ में रक्षाबंधन के दो स्वरूप माने जा सकते हैं। पहला भाई और बहन के बीच नैसर्गिक स्नेह का बंधन है, जबकि दूसरा परिस्थितियों से पैदा हुआ ऐसा रक्षा-संबंध है, जिसमें दो पक्ष संकट के समय एक-दूसरे की सहायता और सुरक्षा का भरोसा देते हैं। इतिहास में राजाओं और शासकों के बीच वैवाहिक संबंधों, मित्रता, संधियों और संरक्षण के अनेक उदाहरण मिलते हैं। रक्षा-सूत्र से जुड़ी कथाएं भी इसी व्यापक राजनीतिक-सामाजिक परंपरा का हिस्सा रही हैं।
कर्णावती और हुमायूं का चर्चित प्रसंग
रक्षाबंधन से जुड़ा सबसे प्रसिद्ध राजनीतिक आख्यान मेवाड़ की रानी कर्णावती और मुगल सम्राट हुमायूं का है। हालांकि इस कथा के ऐतिहासिक विवरण और विशेष रूप से राखी भेजे जाने की प्रामाणिकता को लेकर इतिहासकारों में मतभेद हैं, फिर भी भारतीय जनमानस में यह कथा सदियों से भाई-बहन के रिश्ते और राजनीतिक संरक्षण के प्रतीक के रूप में प्रचलित है।
लोकप्रिय आख्यान के अनुसार, 1535 में गुजरात के सुल्तान बहादुर शाह ने चित्तौड़ पर आक्रमण किया। राणा सांगा की मृत्यु के बाद मेवाड़ कठिन राजनीतिक परिस्थितियों से गुजर रहा था और रानी कर्णावती अपने अल्पवयस्क पुत्र विक्रमादित्य की संरक्षिका के रूप में शासन की जिम्मेदारी संभाल रही थीं। कहा जाता है कि संकट गहराने पर उन्होंने मुगल सम्राट हुमायूं को संदेश के साथ रक्षा-सूत्र भेजकर सहायता मांगी और उसे भाई का दर्जा दिया।
कथा के अनुसार हुमायूं ने इस आग्रह को स्वीकार किया और चित्तौड़ की सहायता के लिए आगे बढ़ा, लेकिन उसकी सहायता समय पर नहीं पहुंच सकी। बहादुर शाह की सेना के सामने चित्तौड़ की स्थिति अत्यंत गंभीर हो गई और मार्च 1535 में रानी कर्णावती सहित बड़ी संख्या में राजपूत महिलाओं ने जौहर किया।
यह प्रसंग ऐतिहासिक रूप से जितना चर्चित है, उतना ही विवादित भी। इसलिए इसे प्रमाणित राजनीतिक संधि के बजाय रक्षा-सूत्र से जुड़ी एक लोकप्रिय ऐतिहासिक परंपरा के रूप में देखना अधिक उचित होगा। फिर भी यह कथा इस बात का महत्वपूर्ण उदाहरण है कि भारतीय समाज में रक्षा-सूत्र की कल्पना रक्त-संबंधों की सीमा से बाहर जाकर राजनीतिक संरक्षण और सहायता से भी जुड़ती रही है।
राजा बलि और लक्ष्मी का पौराणिक प्रसंग
रक्षा-सूत्र के राजनीतिक अथवा हित-संरक्षण वाले स्वरूप की एक कथा पुराण-परंपरा में भी मिलती है। राजा बलि और भगवान विष्णु से जुड़ी कथा के अनुसार विष्णु ने बलि को दिए वचन के कारण उसके यहां रहने का निर्णय लिया। इससे चिंतित देवी लक्ष्मी ने राजा बलि को रक्षा-सूत्र बांधकर अपना भाई बनाया। बलि ने बहन को उपहार मांगने को कहा तो लक्ष्मी ने विष्णु को अपने साथ लौटने की अनुमति मांगी। इस प्रकार रक्षा-सूत्र यहां भी केवल भाई-बहन के पारिवारिक संबंध तक सीमित नहीं रहता, बल्कि एक उद्देश्य की पूर्ति और परस्पर वचनबद्धता का माध्यम बनता है।
आधुनिक राजनीति के अपने ‘रक्षा-सूत्र’
आज रक्षा-सूत्र भले ही राजनीतिक संधियों का औपचारिक माध्यम न हो, लेकिन भारतीय राजनीति में संरक्षण और परस्पर हितों पर आधारित रिश्तों की कमी नहीं है। चुनावी गठबंधन बनते और टूटते हैं, कल तक एक-दूसरे पर गंभीर आरोप लगाने वाले दल अगले चुनाव में साथ खड़े दिखाई देते हैं और सत्ता के समीकरण बदलते ही पुराने राजनीतिक विरोधी नए सहयोगी बन जाते हैं।
दल-बदल की राजनीति ने इस प्रवृत्ति को और रोचक बना दिया है। जिन नेताओं पर विपक्ष में रहते हुए भ्रष्टाचार अथवा दूसरे गंभीर आरोप लगाए जाते हैं, उन्हीं के सत्ताधारी गठबंधन में शामिल होते ही राजनीतिक भाषा बदल जाती है। दूसरी ओर सत्ता छोड़कर विपक्ष में जाने वाले व्यक्ति के पुराने मामलों और आरोपों को नए सिरे से राजनीतिक मुद्दा बनाया जाने लगता है। हालांकि किसी व्यक्ति के विरुद्ध आपराधिक मामले का समाप्त होना या उसे दोषमुक्त किया जाना अंततः कानून और न्यायिक प्रक्रिया का विषय है, फिर भी जांच एजेंसियों के इस्तेमाल और दल-बदल के बाद नेताओं के प्रति राजनीतिक रुख बदलने के आरोप भारतीय राजनीति में बार-बार उठते रहे हैं।
इस अर्थ में आधुनिक राजनीति के भी अपने अदृश्य ‘रक्षा-सूत्र’ हैं। इनमें राखी का धागा नहीं होता, लेकिन सत्ता में भागीदारी, चुनावी सहयोग, पद, समर्थन और राजनीतिक संरक्षण जैसे हितों की गांठें अवश्य होती हैं। फर्क इतना है कि भाई-बहन का नैसर्गिक रक्षा-सूत्र स्नेह और विश्वास पर टिका होता है, जबकि राजनीति का रक्षा-सूत्र अक्सर परिस्थितियों और हितों के बदलने तक ही मजबूत रहता है।
रक्षाबंधन का वास्तविक संदेश निस्संदेह प्रेम, विश्वास और सुरक्षा है। इतिहास और राजनीति की ओर नजर डालें तो यही ‘रक्षा’ जब निजी संबंधों से निकलकर सत्ता और शासन के क्षेत्र में प्रवेश करती है, तो उसका स्वरूप संधि, सहयोग और संरक्षण में बदल जाता है। शायद इसीलिए रक्षा-सूत्र केवल एक सांस्कृतिक प्रतीक नहीं, बल्कि भारतीय सामाजिक और राजनीतिक कल्पना में परस्पर दायित्व का भी एक दिलचस्प प्रतीक रहा है।
