युद्धपोत को देखकर याद आया एक पुराना गढ़वाली लोकगीत

-गोविंद प्रसाद बहुगुणा _-
विशाखापट्टनम में लंगर डाले भारतीय नौसेना के इस युद्धपोत को देखकर सहसा एक पुराने गढ़वाली लोकगीत की याद ताजा हो गई। यह गीत हमारे छात्र जीवन की स्मृतियों से गहराई से जुड़ा हुआ है।
रुद्रप्रयाग इंटर कॉलेज में सांस्कृतिक कार्यक्रमों के अवसर पर हमारे पीटी शिक्षक, जिन्हें हम स्नेह से ‘पीटी बोडा’ कहते थे, श्री हरिकृष्ण पोखरियाल गुरुजी बड़े भावपूर्ण अंदाज में यह गीत गाया करते थे। स्वयं सेवानिवृत्त फौजी रहे गुरुजी हारमोनियम बजाते हुए, गर्दन हिला-हिलाकर इतनी तन्मयता से गाते थे कि श्रोता भावविभोर हो उठते थे। उनके इस गीत की फरमाइश किए बिना कोई भी सांस्कृतिक कार्यक्रम अधूरा माना जाता था।
यह लोकगीत विश्वयुद्ध के दौर में युद्ध के मोर्चे पर जाने वाले एक युवा सैनिक की मनःस्थिति का मार्मिक चित्रण करता है। सात समंदर पार युद्ध के लिए रवाना होने वाला जवान अपनी मां से लिपटकर विदा लेते समय मन में उठ रही आशंकाओं, बिछोह की पीड़ा और अनिश्चित भविष्य की भावनाओं को कुछ इस तरह व्यक्त करता है—
“सात समोदर पार च जाऽऽण ब्वे,
जाज मा जौंलू कि ना।
जिकुड़ी उदास ब्वे, जिकुड़ी उदास,
जाज मा जौंलू कि ना….”
दशकों बाद भी इस गीत की धुन कानों में गूंजती है और गुरुजी का हारमोनियम बजाते हुए गाने का वह दृश्य आंखों के सामने सजीव हो उठता है। एक युद्धपोत ने आज न केवल उस लोकगीत की, बल्कि बचपन, विद्यालय और अपने प्रिय गुरुजी की अनमोल स्मृतियों की भी याद दिला दी।

