मजीठिया : वेजबोर्ड बनातीं ही क्यूं हैं सरकारें…

–अरुण श्रीवास्तव देहरादून-
तारीख…तारीख… तारीख। ले लो एक और तारीख। कुछ ऐसा ही हाल है डेढ़ दशक से देश की अदालतों व राज्यों के श्रम विभागों में मजीठिया वेज बोर्ड के तहत अपने बेहतर जीवन की लड़ाई लड़ रहे सैंकड़ों पत्रकारों का। बताते चलें कि अब तक केंद्र सरकारों ने चाहे वो कांग्रेसी रहीं हों या गैर कांग्रेसी कुल जमा छह वेज़ बोर्डों का गठन पत्रकारों के कल्याण के लिए किया पर अब तक किसी वेज़ बोर्ड ने पत्रकारों का कल्याण नहीं किया उल्टे सैंकड़ों की नौकरी खा गया। अखबारों ने संविदा पर पत्रकार रखने शुरू कर दिए। कई अखबारों में निचले पायदान से लेकर संपादक तक ठेके पर हैं।
ताज़ा मामला सुप्रीम कोर्ट के उस फैसले का है जिसे उसने 11 अगस्त 2026 को दिया था। हालांकि ये मामला महाराष्ट्र का है। बावजूद इसके इसका असर हर उन राज्यों पर असर डालेगा जहां के श्रम सचिवों ने अपने अपने अधीनस्थ अधिकारियों को मामलों को सुनने और विवाद होने पर उसे सक्षम अदालतों को भेजने के लिए दे रखें हैं क्योंकि श्रमजीवी पत्रकार अधिनियम 1955 तो सब पर लागू होता है।
इस फैसले में कोर्ट ने श्रम कानून की धारा 17 (2) के तहत श्रम सचिवों को पॉवर डेलिगेट करने को असंवैधानिक करार दिया है। ज्ञात हो कि, कई राज्यों के श्रम सचिवों ने अपने अधीनस्थ अधिकारियों श्रमायुक्त, उप श्रमायुक्त और सहायक श्रमायुक्त को श्रम कानून की धारा 17 (1) और 17 (2) का अधिकार सौंपा था। यानी उक्त अधिकारी धारा 17 (1) एक तहत वादों को सुन सकते हैं और विवाद की स्थिति होने पर 17 (2) के तहत उसे श्रम न्यायालय को भेज सकते हैं।
उत्तराखंड भी अछूता नहीं : राज्य बने कुछ ही साल हुए थे कि वहां के तत्कालीन श्रम सचिव ने भी अपने अधिकार उक्त अधिकारियों को दे दिए। हो सकता है कि उन्हें मजदूरों के मामले सुनने में हीनता महसूस हो रही हो कि आईएसआई होकर मजदूरों की समस्याएं सुने/निपटाएं!
बताते चलें कि, इस लेख को लिखने वाले ने भी अप्रैल 16 में मजीठिया वेज बोर्ड की संस्तुतियों के अनुसार वेतन और अन्य परिलाभ दिलाये जाने के लिए हल्द्वानी स्थित श्रम मुख्यालय में अपना दावा प्रस्तुत किया था और उक्त कार्यालय ने उसके आवेदन पत्र को देहरादून स्थित कार्यालय भेजा। यहां यह भी बताना ज़रूरी सा है कि यह गढ़वाल मंडल में पहला दावा था। विवाद होने पर मेरे दावे को श्रम न्यायालय देहरादून को भेजा गया। अब ऐसी स्थिति में वादी कहां से दोषी है?
बड़ी कठिन है डगर पनघट की : वेतन आयोगों का गठन केवल पत्रकारों के लिए नहीं होता केंद्र एवं
राज्य सरकारों के कर्मचारियों के लिए ही नहीं होता बल्कि केंद्र व राज्य सरकारों के निगमों, नगर पालिकाओं पर भी लागू होता है। पर किसी एक भी कर्मचारी को इसके लिए मशक्कत नहीं करनी पड़ती जितनी पत्रकारों को। अपना दावा प्रस्तुत करिए, कितना राशि बनती है वह दर्शाइए और उसे जज साहब के सामने साबित भी करिए। मसलन ये नया बेसिक,डीए,एचआरए कहां से आया, टीए व नाइट शिफ्ट को परिभाषित करिए। अपने अखबार की श्रेणी के लिए माथापच्ची करिए। जिससे दावा बनवाया है उसे बतौर गवाह अदालत में हाजिर करिए और उसके उसका मेहनताना देने के बाद नाज़-नखरे भी उठाइए। इस नाचीज़ ने भी उठाया। क्लेम बनाने वाले को एक बार नहीं तीन-तीन बार श्रम न्यायालय में पेश किया। अगर प्रतिवादी जो कि अखबार (द हिंदू , टाइम्स ऑफ इंडिया या सहारा इंडिया) का मालिक होता है लाखों-करोड़ों में खेलता है वह वादी के गवाह को कई बार बुला सकता है पर आने जाने रहने खाने पीने का खर्चा नहीं देगा उसे देगा कौन वादी पत्रकार चाहे वो नौकरी पर हो या न हो। तुर्रा यह कि ऐसा श्रम कानून में लिखा है। इससे तो बेहतर है कि श्रम न्यायालय का नाम बदल कर मालिकान न्यायालय कर दिया जाए।
करे कोई भरे कोई : सुप्रीम कोर्ट में मजीठिया मामले की सुनवाई कर रहे तत्कालीन न्यायाधीश रंजन गोगोई ने अपने अंतिम आदेश में प्रिंट मीडिया के उन सभी पत्रकारों व गैर पत्रकारों को जो इस वेतन आयोग के अनुसार वेतन और अन्य परिलाभ चाहते हैं वे अपने-अपने श्रमायुक्त कार्यालय में आवेदन करें। इसी आदेश के अनुपालन में इस वादी ने भी यही प्रक्रिया अपनाई। उसकी क्या ग़लती। माननीय न्यायाधीश ने जैसा कहा वैसा किया गया। क्या वेज़ बोर्ड मामले की सुनवाई कर रहे जजों (सुप्रीम कोर्ट में दो जज की पीठ होती है) को इतना भी पता नहीं कि, पत्रकार अपना दावा किसके सामने पेश करें। ताजा आदेश में छह महीने का समय दिया गया है। तब तक मामला वहीं पर उसी स्थिति में रुका रहेगा। उक्त आदेश में न तो किसी को दोषी ठहराया गया और न ही उसे दंडित किए जाने की बात कही गई। जबकि हर जुर्म की सज़ा होती है सिवाय दो को छोड़ कर। वो दो ज़ुर्म है आत्महत्या और तख्तापलट।
(लेख में प्रकट विचार लेखक के निजी हैं जिनसे एडमिन का सहमत होना जरूरी नहीं है -एडमिन)
