आधुनिक भारत के विद्यार्थी की ज्ञान यात्रा

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-वीरेंद्र सिंह रावत

मै एक भारत का विद्यार्थी हू , मुझे हर दिन खुद को साबित करना पड़ता है, कि मै एक विद्यार्थी हू बालक नहीं , मेरी पहचान ये ही है कि मै सरकार द्वारा मेरे लिए निर्धारित पाठ्यक्रम को याद करने में कितना सक्षम हू।
मेरे परिवारजन हो या शिक्षक मुझे कोई समझने को तैयार नहीं है, मेरे इर्द गिर्द हर जीवित सफल या असफल व्यक्ति मेरा सलाहकार है। मेरे स्कूल में जिन लोगो ने कभी इंजिनीरिंग, मेडिकल, प्रशासन , प्रबंधन, कला संस्कृति या औद्योगिक सहसकिता का नाम भी नहीं सुना होगा वो लोग मुझे ये सारे विषयो में पारंगत होने ज्ञान देते है।
मेरे लिए पाठ्यक्रम सरकार द्वारा निर्धारित शिक्षा अनुसंधान संस्था बनाती है जो मुझे आज तक जानती भी नहीं है। मुझे क्या पढ़ना है ,ये मेरे अलावा सब लोग तय करते है।
मेरे माता पिता ने मुझे ज्ञानी बनाने के लिए मेरा नामांकन स्कूल में कराया , पर कुछ दिनों बाद में मुझे पता लगा कि , मेरा स्कूल तो एक स्थानीय बड़े व्यापारी का है, जिसमे उसने कुछ लोगो को शायद शिक्षकों को नौकर बनाकर मुनाफा कमाने के लिए रखा है। मेरे स्कूल के मालिक मेरे पीने के लिए पानी से लेकर पास होने के लिए ली जाने वाली परीक्षा तक हर चीज के पैसे लेते है।
पढाई के दौरान मुझे अपने ईश्वर के नाम लेने की इच्छा हुई अपने धर्म को जानने की जिज्ञासा हुई , और अपनी जाति के बारे में भी समझने की उत्कंठा हुई ,पर मेरे स्कूल ने बताया कि हमारा देश सेक्युलर है, और सेक्युलर देश में मेरे ईश्वर का नाम लेने की अनुमति नहीं है , मेरे धर्म और धार्मिक ज्ञान को समझने की जरुरत नहीं है , मेरी जाति की जानकारी रखने का हक़ सिर्फ सरकार को है , मुझे नहीं। स्कूल से नाम हटाने के समय दिए जाने वाले प्रमाण पत्र पर ही मेरा धर्म और जाति अंकित होगी और कंही नहीं।
मेरे माता पिता को मुझसे नहीं मेरेद्वारा परीक्षा में प्राप्त गुणों से ही प्रेम है। ज्यादा गुण प्राप्त करने के लिए मुझे ट्यूशन या कोचिंग में भेजा जाता है। ट्यूशन या कोचिंग वले इतने अच्छे है कि यंहा जितने गन चाहिए उतने मिल जाते है। यंहा ज्ञान के अलावा सब कुछ आसानी से मिल जाता है।
फिर कुछ वर्षो बाद बोर्ड की परीक्षाएं आती है , ये बोर्ड वाले शायद हिरणाकश्यप के वंशज ही होते होंगे। बोर्ड वाले ऐसा मानते है कि ईश्वर को भी इनके बोर्ड की परीक्षा में पास होने के बाद ही ईश्वर के पद पर रहने का अवसर मिला है । बोर्ड वाले खुद को सरस्वती के उपासक नहीं मानते, ये लोग उस हर विद्यार्थी के लिए प्रश्न पत्र बनाते है जिनको इन्होने कभी नहीं देखा भी नहीं और न ही कभी पढ़ाया है। ये लोग ऐसा मानते है की विद्यार्थी को पढ़ाने वाला शिक्षक विद्यार्थी की परीक्षा लेने योग्य नहीं है और न ही शिक्षक में इतना कौशल्य है, कि वो विद्यार्थी का सही मूल्यांकन कर सके।
बोर्ड की परीक्षाओ के दौरान ही में फ्लाइंग स्कवाड के रूप में आकाश मार्ग से अनेक राक्षस अवतरित होते है, और वो प्राणी बोर्ड की परीक्षा देते समय किसी भी रूप में किसी भी समय प्रकट हो जाते है , जिससे परीक्षार्थियों की एकाग्रता भंग हो जाती है और वो बोर्ड की परीक्षा में असफल होने वाले संभावित परीक्षार्थी बन जाते है ।
उसके बाद परीक्षार्थी की उत्तरवही की जाँच वो व्यक्ति करता है जो परीक्षार्थी को जनता तक नहीं है। बोर्ड वाले परीक्षार्थी की पहचान भी जांचकर्ता से भी छुपा कर रखते है , क्योंकि बोर्ड वाले खुद के सिवाय ईशर पर भी भरोसा नहीं करते ।
कुछ दिनों के बाद बोर्ड की परीक्षा का परिणाम घोषित हो जाते है , और परीक्षा में प्राप्त गुण ही परीक्षार्थी की समाज मेरी पहचान , जाति , धर्म और गोत्र बन जाते है।

मुझे जीवन में अपना धेय और सपनो को साकार करने के लिए ज्ञान चाहिए था, पर मुझे सरकार के परीक्षा बोर्ड का प्रमाणपत्र थमा कर मुझे जीवन के अंधकार में धकेल दिया गया। मेरी शिक्षा से से मेरे अलावा सब लाभान्वित हो गए।

वीरेंद्र रावत
संस्थापक – ग्रीन मेंटर्स

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