मुंडा जनजाति : क्या सचमुच वे आधुनिक नागरिकता व्यवस्था से पहले के मूल निवासी हैं?
The Munda are among India’s oldest indigenous tribal communities, primarily inhabiting Jharkhand, Odisha, West Bengal, Chhattisgarh, and Bihar. A recent voter roll revision in Jharkhand’s Khunti district drew national attention when some Munda families claimed they predate the modern concept of citizenship and identify themselves as “Ante Christum (AC).” While this does not represent the entire community, it highlights their deep historical identity. The Mundas are known for their nature-centric Sarna faith, communal traditions, unique marriage and funeral customs, vibrant festivals, and environmental stewardship. Their legacy was immortalized by freedom fighter Birsa Munda, who led the historic Ulgulan against British rule.The Munda are among India’s oldest indigenous tribal communities, primarily inhabiting Jharkhand, Odisha, West Bengal, Chhattisgarh, and Bihar. A recent voter roll revision in Jharkhand’s Khunti district drew national attention when some Munda families claimed they predate the modern concept of citizenship and identify themselves as “Ante Christum (AC).” While this does not represent the entire community, it highlights their deep historical identity. The Mundas are known for their nature-centric Sarna faith, communal traditions, unique marriage and funeral customs, vibrant festivals, and environmental stewardship. Their legacy was immortalized by freedom fighter Birsa Munda, who led the historic Ulgulan against British rule.

–जयसिंह रावत
झारखंड के खूंटी जिले के बारबांदा गांव से हाल में सामने आई एक खबर ने पूरे देश का ध्यान मुंडा जनजाति की ओर आकर्षित किया है। मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (Special Intensive Revision-SIR) के दौरान गांव के कुछ मुंडा परिवारों ने मतदाता प्रपत्र भरने से इनकार करते हुए कहा कि “हम आधुनिक नागरिकता और दस्तावेज़ों की व्यवस्था से पहले के लोग हैं।” वे स्वयं को इस भूमि का सबसे प्राचीन निवासी बताते हैं और अपने नाम के आगे “एसी (AC)” लिखते हैं, जिसका अर्थ वे “एंटे क्रिस्टम (Ante Christum)” अर्थात “ईसा मसीह के जन्म से पहले” बताते हैं। उनका कहना है कि उनकी पहचान किसी सरकारी दस्तावेज़ की मोहताज नहीं है।
यह दृष्टिकोण पूरे मुंडा समाज का नहीं, बल्कि खूंटी क्षेत्र के कुछ परिवारों का दावा है। फिर भी इस घटना ने भारत की सबसे प्राचीन जनजातियों में से एक मुंडा समुदाय के इतिहास, संस्कृति और अस्मिता को लेकर नई जिज्ञासा पैदा कर दी है।
कौन हैं मुंडा?
मुंडा भारत की प्रमुख अनुसूचित जनजातियों में से एक है। मानवशास्त्रियों के अनुसार वे ऑस्ट्रो-एशियाटिक (ऑस्ट्रिक) भाषा परिवार की मुण्डा शाखा से संबंधित हैं। अनेक इतिहासकारों का मानना है कि आर्यों के आगमन से पहले भी इस समुदाय का भारतीय उपमहाद्वीप में निवास था। इसी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि के आधार पर समुदाय के अनेक लोग स्वयं को भारत के मूल निवासियों में गिनते हैं।
मुंडा समाज की पहचान केवल एक जनजाति के रूप में नहीं, बल्कि जंगल, जल और जमीन के साथ गहरे संबंध रखने वाले समुदाय के रूप में रही है। उनकी जीवन शैली प्रकृति के साथ सह-अस्तित्व पर आधारित है।
बिरसा मुंडा और उलगुलान
मुंडा समाज का इतिहास संघर्ष और स्वाभिमान का इतिहास है। उन्नीसवीं शताब्दी के अंत में अंग्रेजी शासन और जमींदारी व्यवस्था के खिलाफ भगवान बिरसा मुंडा ने 1899-1900 में उलगुलान (महाविद्रोह) का नेतृत्व किया। इस आंदोलन ने आदिवासी भूमि अधिकारों की रक्षा की लड़ाई को नई दिशा दी और अंग्रेजी शासन को अपनी नीतियों पर पुनर्विचार करने के लिए विवश किया। आज बिरसा मुंडा भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के महान जननायकों में गिने जाते हैं।
जनसंख्या और निवास क्षेत्र
2011 की जनगणना के अनुसार भारत में मुंडा जनजाति की आबादी लगभग 20 से 22 लाख है। सबसे अधिक मुंडा झारखंड में रहते हैं। इनके प्रमुख निवास क्षेत्र हैं—
झारखंड : खूंटी, रांची, गुमला, सिमडेगा, पश्चिमी सिंहभूम।
ओडिशा : सुंदरगढ़, क्योंझर, मयूरभंज।
पश्चिम बंगाल : पुरुलिया और आसपास के क्षेत्र।
छत्तीसगढ़, बिहार तथा असम के कुछ हिस्से।
रोजगार और शिक्षा के कारण आज उनकी छोटी-छोटी आबादी देश के अन्य राज्यों में भी बस चुकी है।

प्रकृति से जुड़ी जीवन शैली
मुंडा समाज का जीवन खेती, वनों से मिलने वाले उत्पाद और पशुपालन पर आधारित है। उनके पारंपरिक घर मिट्टी, लकड़ी और खपरैल से बनाए जाते हैं। जंगल उनके लिए केवल आजीविका का साधन नहीं, बल्कि जीवन का आधार और आस्था का केंद्र भी है।
खूंटी के बारबांदा गांव से प्रकाशित समाचार के अनुसार वहां के कुछ परिवार आज भी गैस चूल्हे और अन्य आधुनिक उपकरणों का सीमित उपयोग करते हैं। उनका कहना है कि वे सरकारी पहचान पत्र नहीं बनवाते और सरकारी राशन जैसी योजनाओं का लाभ भी नहीं लेते। यह उल्लेखनीय है कि यह स्थिति पूरे मुंडा समाज की नहीं, बल्कि उस गांव के कुछ परिवारों से संबंधित बताई गई है।
सरना धर्म और प्रकृति पूजा
मुंडा समुदाय की पारंपरिक आस्था सरना धर्म में है। वे प्रकृति, सूर्य, जल, पर्वत, जंगल और पूर्वजों की पूजा करते हैं। प्रत्येक गांव में स्थित सरना स्थल या पवित्र उपवन धार्मिक और सामाजिक जीवन का केंद्र होता है। यहां वर्ष में कई बार सामूहिक पूजा होती है।/समय के साथ समुदाय के कुछ लोगों ने ईसाई धर्म भी अपनाया है, लेकिन सरना परंपरा आज भी व्यापक रूप से जीवित है।
भाषा और लोक संस्कृति
मुंडा समाज की प्रमुख भाषा मुंडारी है, जो ऑस्ट्रो-एशियाटिक भाषा परिवार की प्रमुख भाषाओं में गिनी जाती है। इसके अलावा वे हिंदी, नागपुरी, ओड़िया और स्थानीय भाषाओं का भी प्रयोग करते हैं। सरहुल, करमा, सोहराय और मागे पर्व उनके प्रमुख त्योहार हैं। इन अवसरों पर पुरुष और महिलाएं रंग-बिरंगी पारंपरिक वेशभूषा पहनकर मंदर, नगाड़ा, बांसुरी और अन्य लोक वाद्यों की धुन पर सामूहिक नृत्य करते हैं।
विवाह की अनूठी परंपरा
मुंडा समाज में विवाह केवल दो व्यक्तियों का नहीं, बल्कि दो परिवारों और समुदायों का संबंध माना जाता है। विवाह तय करने में परिवारों के साथ गांव के बुजुर्गों, मुंडा (ग्राम प्रधान) और पहान (धार्मिक पुरोहित) की महत्वपूर्ण भूमिका होती है।
युवक और युवती की सहमति को भी महत्व दिया जाता है। कई क्षेत्रों में वधू-मूल्य (ब्राइड प्राइस) की परंपरा रही है, जिसमें वर पक्ष प्रतीकात्मक रूप से वधू पक्ष को सम्मानस्वरूप भेंट देता है। विवाह समारोह में पूरी रात सामूहिक नृत्य, लोकगीत और पारंपरिक वाद्ययंत्रों की गूंज रहती है। नवदंपती प्रकृति और पूर्वजों को साक्षी मानकर वैवाहिक जीवन का संकल्प लेते हैं।
मृत्यु संस्कार
मुंडा समाज मृत्यु को जीवन का अंत नहीं, बल्कि पूर्वजों के संसार में प्रवेश मानता है। अधिकांश क्षेत्रों में दाह संस्कार किया जाता है, जबकि कुछ स्थानों पर दफनाने की परंपरा भी है। अंतिम संस्कार के बाद निर्धारित समय पर पूर्वजों की स्मृति में विशेष अनुष्ठान किए जाते हैं। उनका विश्वास है कि पूर्वज परिवार और गांव की रक्षा करते हैं।
अखड़ा : संस्कृति का विद्यालय
लगभग हर पारंपरिक मुंडा गांव में अखड़ा होता है। यह केवल नृत्य का मैदान नहीं, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन का केंद्र है। यहीं युवाओं को लोकगीत, नृत्य, वाद्ययंत्र, सामाजिक नियम और सामुदायिक परंपराएं सिखाई जाती हैं।
प्रकृति संरक्षण की परंपरा
मुंडा समाज सदियों से पर्यावरण संरक्षण का पक्षधर रहा है। कई गांवों में आज भी पवित्र वन (Sacred Groves) सुरक्षित रखे जाते हैं, जहां पेड़ काटना या शिकार करना सामाजिक अपराध माना जाता है। जंगल को वे केवल संसाधन नहीं, बल्कि जीवित देवता का स्वरूप मानते हैं।
सामुदायिक न्याय व्यवस्था
मुंडा समाज में छोटे-मोटे विवादों का निपटारा परंपरागत ग्राम सभा, ग्राम प्रधान (मुंडा) और पाहान की मौजूदगी में किया जाता रहा है। इसका उद्देश्य दंड देने से अधिक सामाजिक सद्भाव बनाए रखना होता है।
मतदाता बनने में भी रुचि नही ?
खूंटी में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण के दौरान सामने आई घटना केवल चुनावी प्रक्रिया का मामला नहीं है। यह आदिवासी अस्मिता, पारंपरिक जीवन पद्धति और आधुनिक नागरिकता व्यवस्था के बीच संबंधों पर भी गंभीर प्रश्न उठाती है। प्रशासन इसे संवैधानिक प्रक्रिया बता रहा है, जबकि संबंधित ग्रामीण अपनी प्राचीन पहचान और जीवन दर्शन को अधिक महत्व देते हैं।
हालांकि मुंडा समाज का बड़ा हिस्सा आज शिक्षा, सरकारी सेवाओं, राजनीति, सेना, खेल और अन्य क्षेत्रों में सक्रिय है तथा भारतीय लोकतांत्रिक व्यवस्था का अभिन्न अंग है। इसलिए बारबांदा गांव के कुछ परिवारों की धारणा को पूरे मुंडा समुदाय का दृष्टिकोण नहीं माना जा सकता।
सांस्कृतिक विरासत का एक महत्वपूर्ण अध्याय
मुंडा जनजाति भारत की सांस्कृतिक विरासत का एक महत्वपूर्ण अध्याय है। प्रकृति के साथ संतुलित जीवन, सामुदायिक व्यवस्था, लोक संस्कृति, पर्यावरण संरक्षण और स्वतंत्रता संग्राम में उनके योगदान ने उन्हें विशिष्ट पहचान दी है। खूंटी की हालिया घटना ने एक बार फिर यह याद दिलाया है कि भारत में ऐसे समुदाय आज भी मौजूद हैं, जिनकी ऐतिहासिक स्मृतियां आधुनिक प्रशासनिक व्यवस्थाओं से कहीं अधिक पुरानी हैं। ऐसे में विकास, संवैधानिक अधिकार और आदिवासी सांस्कृतिक अस्मिता—इन तीनों के बीच संतुलन स्थापित करना भारतीय लोकतंत्र की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है।
—————————————-
Note:-लेखक जनजातीय मामलों के जानकार हैं तथा जनजातियों पर उनकी दो पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं, जिनमे एक पुस्तक भारत सरकार के एनबीटी ने भी प्रकाशित की है- एडमिन
