सितंबर में सामान्य से कम बारिश का अनुमान, 126 वर्षों में सबसे गर्म रहा अगस्त
नई दिल्ली, 1 सितंबर। देश में इस साल मानसून कमजोर रहने की आशंका अब और बढ़ गई है। भारत मौसम विज्ञान विभाग (आईएमडी) ने सितंबर 2026 में पूरे देश में औसत बारिश दीर्घावधि औसत (एलपीए) के 91 प्रतिशत से कम रहने का अनुमान जताया है। सितंबर दक्षिण-पश्चिम मानसून का अंतिम महीना है, इसलिए इस महीने भी बारिश कम रही तो जून से सितंबर तक पूरे मानसून सत्र का अंत सामान्य से काफी कम वर्षा के साथ हो सकता है।
आईएमडी ने इससे पहले पूरे मानसून सत्र में देशभर में बारिश दीर्घावधि औसत की करीब 90 प्रतिशत रहने का अनुमान लगाया था। भारत में जून से सितंबर के मानसून की दीर्घावधि औसत वर्षा करीब 87 सेंटीमीटर है। विभाग ने मई में ही सामान्य से कम मानसून की संभावना 84 प्रतिशत बताई थी।
अगस्त ने तोड़ा 126 साल का गर्मी का रिकॉर्ड
बारिश की कमी के साथ इस बार अगस्त ने तापमान का भी नया रिकॉर्ड बनाया है। अगस्त 2026 भारत में 1901 के बाद का सबसे गर्म अगस्त रहा। इस महीने देश का औसत तापमान 28.01 डिग्री सेल्सियस दर्ज किया गया, जो दीर्घावधि औसत से लगभग 0.67 डिग्री अधिक था।
क्षेत्रवार स्थिति भी असामान्य रही। दक्षिण प्रायद्वीपीय भारत में यह 1901 के बाद दूसरा सबसे गर्म अगस्त, पूर्वी और पूर्वोत्तर भारत में तीसरा तथा उत्तर-पश्चिम भारत में पिछले 126 वर्षों का पांचवां सबसे गर्म अगस्त रहा।
इस असामान्य गर्मी के पीछे बारिश की कमी को भी बड़ा कारण माना जा रहा है। सामान्यतः मानसून के बादल और वर्षा दिन के तापमान को नियंत्रित रखते हैं। बारिश कम होने और लंबे शुष्क अंतराल के कारण जमीन अधिक गर्म होती है और तापमान बढ़ने लगता है।
अगस्त में 16 प्रतिशत से अधिक कम बरसे बादल
अगस्त में देश में सामान्य से 16 प्रतिशत से अधिक कम बारिश हुई। इससे जून से अगस्त तक मानसूनी वर्षा की कुल कमी बढ़कर 14 प्रतिशत हो गई। जुलाई में बारिश सामान्य रही थी, लेकिन जून की शुरुआत बेहद कमजोर रही और उस महीने वर्षा की कमी करीब 35 प्रतिशत तक पहुंच गई थी।
देश के 741 जिलों के आकलन में स्थिति की गंभीरता और स्पष्ट होती है। 31 अगस्त तक 312 जिलों यानी 42 प्रतिशत में सामान्य से कम बारिश दर्ज हुई, जबकि 38 जिलों यानी पांच प्रतिशत में वर्षा की बहुत अधिक कमी रही। यानी देश के लगभग 47 प्रतिशत जिले किसी न किसी गंभीर वर्षा-कमी की श्रेणी में रहे।
सितंबर में कहां हो सकती है अच्छी बारिश?
इसका अर्थ यह नहीं है कि सितंबर में पूरे देश में बारिश नहीं होगी। आईएमडी के अनुसार देश के अधिकांश हिस्सों में सामान्य से कम वर्षा की संभावना है, लेकिन उत्तर-पश्चिम, पूर्वोत्तर, पूर्वी और पूर्व-मध्य भारत के कुछ हिस्सों तथा दक्षिण-पूर्वी प्रायद्वीपीय भारत के कुछ क्षेत्रों में सामान्य से अधिक बारिश भी हो सकती है। इसलिए राष्ट्रीय औसत कम रहने के बावजूद कुछ इलाकों में भारी वर्षा की घटनाएं संभव हैं।
यही कारण है कि कमजोर मानसून का मतलब बाढ़ या अत्यधिक बारिश का खतरा समाप्त होना नहीं है। जलवायु परिवर्तन के दौर में वर्षा का वितरण अधिक असमान हो सकता है—लंबे समय तक बारिश न होने के बाद कुछ घंटों या दिनों में बहुत अधिक पानी बरस सकता है।
मजबूत ‘अल नीनो’ बना चिंता का कारण
कमजोर मानसून के पीछे इस बार अल नीनो को प्रमुख कारण माना जा रहा है। अल नीनो वह समुद्री-जलवायु स्थिति है जिसमें मध्य और पूर्वी भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर का पानी सामान्य से अधिक गर्म हो जाता है। इसका असर दुनिया के विभिन्न हिस्सों के मौसम पर पड़ता है और भारत में यह प्रायः कमजोर मानसून से जुड़ा रहता है।
आईएमडी प्रमुख मृत्युंजय महापात्र के अनुसार इस समय भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर में मजबूत अल नीनो परिस्थितियां बनी हुई हैं और आने वाले महीनों में इनके और मजबूत होने की संभावना है।
दूसरी ओर हिंद महासागर में इंडियन ओशन डाइपोल (आईओडी) फिलहाल तटस्थ है और सितंबर में भी इसके तटस्थ बने रहने की संभावना है। सकारात्मक आईओडी कई बार अल नीनो के नकारात्मक प्रभाव को कुछ हद तक कम करके भारतीय मानसून को सहारा देता है, लेकिन इस बार ऐसी मदद मिलने के संकेत नहीं हैं।
किसानों के लिए क्यों महत्वपूर्ण है सितंबर की बारिश?
सितंबर की बारिश खेती के लिए बेहद महत्वपूर्ण होती है। खरीफ की धान, मक्का, सोयाबीन, कपास और दलहन जैसी अधिकांश फसलों की बुवाई लगभग पूरी हो चुकी है और कई फसलें महत्वपूर्ण बढ़वार की अवस्था में हैं। पिछले वर्ष के मुकाबले खरीफ का रकबा भी करीब दो प्रतिशत कम बताया गया है। सितंबर में पर्याप्त बारिश न होने पर किसानों को खड़ी फसल बचाने के लिए सिंचाई पर अधिक खर्च करना पड़ सकता है।
भारत में करीब आधी कृषि भूमि अभी भी सुनिश्चित सिंचाई से बाहर है। इसलिए मानसून की कमी का असर केवल खेतों तक सीमित नहीं रहता; इसका प्रभाव ग्रामीण आय, खाद्य उत्पादन, जलाशयों, भूजल, बिजली उत्पादन और अंततः महंगाई तक पहुंच सकता है।
सितंबर की कम बारिश का असर अगली रबी फसल पर भी पड़ सकता है। मानसून के अंतिम दौर की वर्षा मिट्टी में नमी और जलाशयों में पानी जमा करती है, जिसका उपयोग गेहूं, सरसों और दूसरी शीतकालीन फसलों में होता है।
कम बारिश के बीच अतिवृष्टि भी ले रही जान
एक महत्वपूर्ण विरोधाभास यह है कि देश में कुल मानसूनी बारिश कम है, फिर भी स्थानीय स्तर पर भारी बारिश, बिजली गिरने और तूफान जैसी चरम मौसमी घटनाएं लगातार हो रही हैं। आईएमडी के प्रारंभिक आंकड़ों के अनुसार अगस्त में बिजली, आंधी-तूफान और भारी वर्षा जैसी चरम घटनाओं में 113 लोगों की जान गई। हालांकि विभाग ने कहा है कि इस संख्या का राज्यों के आंकड़ों से मिलान किया जाना बाकी है।
इस प्रकार 2026 का मानसून दोहरी चुनौती सामने ला रहा है—एक तरफ देश के बड़े हिस्से में बारिश की कमी और असामान्य गर्मी, दूसरी ओर कुछ क्षेत्रों में अचानक अत्यधिक बारिश और आपदाएं। सितंबर का मौसम अब यह तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा कि चार महीने का मानसून आखिर कितनी बड़ी वर्षा-कमी के साथ विदा होता है।
