ब्लॉग

जिन्ना की बीमारी का राज़: क्या एक मेडिकल रिपोर्ट रोक सकती थी भारत का विभाजन?

 

मुंबई के दो पारसी डॉक्टरों ने 1946 में जाना था पाकिस्तान के भावी संस्थापक की गंभीर बीमारी का सच, लेकिन चिकित्सकीय गोपनीयता ने वह राज़ दुनिया से छिपाए रखा

-जयसिंह रावत-

भारत के विभाजन का इतिहास आम तौर पर मोहम्मद अली जिन्ना की पाकिस्तान की मांग, कांग्रेस और मुस्लिम लीग के बीच बढ़ते मतभेद, ब्रिटिश सत्ता की नीतियों और 1947 की साम्प्रदायिक हिंसा के संदर्भ में पढ़ा जाता है। लेकिन इस इतिहास का एक कम चर्चित और बेहद दिलचस्प अध्याय चिकित्सा जगत से जुड़ा है। सवाल यह है कि यदि 1946 में जिन्ना की गंभीर बीमारी की जानकारी ब्रिटिश सरकार और तत्कालीन राजनीतिक नेतृत्व तक पहुंच गई होती, तो क्या भारत का विभाजन टल सकता था? यह सवाल हाल में फिर चर्चा में आया है। पाकिस्तान ने मुंबई के दो पारसी डॉक्टरों, डॉ. जल रतनजी पटेल और डॉ. जल धायबो-कू, को मरणोपरांत अपने सर्वोच्च नागरिक सम्मानों में से एक ‘निशान-ए-इम्तियाज’ देने का फैसला किया है। दोनों डॉक्टरों को यह सम्मान जिन्ना की बीमारी की गोपनीयता बनाए रखने के लिए दिया जा रहा है। यह सम्मान मार्च 2027 में प्रदान किए जाने की योजना है।

1946 में खुला जिन्ना की बीमारी का राज़

1946 भारतीय इतिहास का निर्णायक वर्ष था। द्वितीय विश्वयुद्ध समाप्त हो चुका था और ब्रिटेन भारत से सत्ता हस्तांतरण की दिशा में बढ़ रहा था। कांग्रेस और मुस्लिम लीग के बीच राजनीतिक दूरी बढ़ रही थी और जिन्ना मुस्लिम लीग के सबसे प्रभावशाली नेता के रूप में पाकिस्तान की मांग को आगे बढ़ा रहे थे। इसी दौर में मुंबई के चिकित्सक डॉ. जल रतनजी पटेल और रेडियोलॉजिस्ट डॉ. जल धायबो-कू ने जिन्ना की चिकित्सकीय जांच की। बाद में प्रकाशित ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार, जांच में उनके फेफड़ों की गंभीर बीमारी का पता चला। जिन्ना लंबे समय से तपेदिक यानी टीबी से पीड़ित थे और उनकी बीमारी काफी आगे बढ़ चुकी थी। Freedom at Midnight में दिए गए विवरण के अनुसार, डॉक्टरों का अनुमान था कि जिन्ना के पास संभवतः बहुत सीमित समय बचा है। यह अनुमान आधुनिक चिकित्सा की तरह निश्चित जीवन-प्रत्याशा नहीं था, बल्कि उस समय उनकी बीमारी की गंभीरता को देखते हुए चिकित्सकीय आकलन था। सबसे महत्वपूर्ण बात यह थी कि यह जानकारी सार्वजनिक नहीं हुई।

बीमारी का पता था, लेकिन उसकी गंभीरता छिपी रही

यह कहना सही नहीं होगा कि जिन्ना की बीमारी के बारे में किसी को जानकारी नहीं थी। उनके परिवार और कुछ करीबी लोगों को उनके स्वास्थ्य की स्थिति का पता था। उनकी बहन फातिमा जिन्ना का नाम भी इस संदर्भ में आता है। असल रहस्य बीमारी के अस्तित्व से ज्यादा उसकी गंभीरता को लेकर था। जिन्ना की राजनीतिक भूमिका इतनी महत्वपूर्ण थी कि यदि यह जानकारी व्यापक राजनीतिक हलकों तक पहुंचती कि वह गंभीर और संभावित रूप से जीवन-घातक बीमारी से जूझ रहे हैं, तो इसका राजनीतिक प्रभाव पड़ सकता था। लेकिन डॉक्टरों ने अपनी चिकित्सकीय जिम्मेदारी निभाई और मरीज की गोपनीयता बनाए रखी।आज के नजरिए से देखें तो डॉक्टर-मरीज के बीच स्वास्थ्य संबंधी जानकारी की गोपनीयता चिकित्सा नैतिकता का मूल सिद्धांत है। 1946 में भी यह पेशेवर जिम्मेदारी मौजूद थी। डॉक्टरों ने यह निर्णय किसी राजनीतिक उद्देश्य से लिया था, ऐसा कोई प्रमाण नहीं है।

क्या माउंटबेटन को पता होता तो कहानी बदल जाती?

यही वह सवाल है जिसने इस घटना को भारत के विभाजन के इतिहास से जोड़ दिया। लैरी कॉलिन्स और डोमिनिक लैपियर की चर्चित पुस्तक Freedom at Midnight में यह दावा सामने आया कि यदि भारत के अंतिम वायसराय लॉर्ड लुई माउंटबेटन को जिन्ना की बीमारी की वास्तविक गंभीरता के बारे में जानकारी होती, तो वह सत्ता हस्तांतरण की प्रक्रिया में कुछ समय की देरी पर विचार कर सकते थे।

इस दावे के पीछे तर्क यह था कि जिन्ना पाकिस्तान की मांग के केंद्रीय राजनीतिक नेता थे। यदि ब्रिटिश सरकार को पता होता कि उनकी राजनीतिक सक्रियता का समय सीमित हो सकता है, तो शायद तत्काल सत्ता हस्तांतरण और विभाजन के बजाय कुछ समय प्रतीक्षा करने का विकल्प सामने आता। ऐसी स्थिति में जिन्ना की राजनीतिक भूमिका कमजोर पड़ सकती थी और मुस्लिम लीग के भीतर नेतृत्व का सवाल उठ सकता था।लेकिन यहां इतिहास और कल्पना के बीच की सीमा को समझना बेहद जरूरी है। यह कहना कि माउंटबेटन को जिन्ना की बीमारी पता होती तो विभाजन निश्चित रूप से रुक जाता, उपलब्ध प्रमाणों से सिद्ध नहीं होता। यह केवल वैकल्पिक इतिहास की एक संभावना है।

विभाजन के पीछे केवल जिन्ना नहीं थे

भारत का विभाजन किसी एक व्यक्ति के निर्णय का परिणाम नहीं था। इसके पीछे वर्षों से चले आ रहे राजनीतिक और साम्प्रदायिक मतभेद थे। कांग्रेस और मुस्लिम लीग के बीच सत्ता-साझेदारी का प्रश्न लगातार जटिल होता गया था। मुस्लिम लीग अलग मुस्लिम राजनीतिक राष्ट्र की मांग पर दृढ़ थी। 1946 के राजनीतिक घटनाक्रम, कैबिनेट मिशन योजना की विफलता और बढ़ती साम्प्रदायिक हिंसा ने परिस्थितियों को और गंभीर बना दिया था। ब्रिटिश सरकार भी भारत से जल्द सत्ता हस्तांतरित करना चाहती थी। पंजाब और बंगाल की परिस्थितियां अलग थीं और वहां विभाजन के प्रश्न ने और जटिलता पैदा कर दी थी। ऐसे में जिन्ना की बीमारी को विभाजन का अकेला कारण मानना इतिहास को बहुत सरल बना देना होगा।

फिर भी जिन्ना का स्वास्थ्य इतना महत्वपूर्ण क्यों था?

इसका उत्तर जिन्ना की राजनीतिक स्थिति में छिपा है।

1940 के दशक के मध्य तक जिन्ना मुस्लिम लीग और पाकिस्तान की मांग के सबसे प्रभावशाली चेहरे बन चुके थे। उनकी अनुपस्थिति या अचानक राजनीतिक रूप से कमजोर हो जाना मुस्लिम लीग की रणनीति को प्रभावित कर सकता था।यही कारण है कि उनकी बीमारी की गंभीरता की जानकारी राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण मानी जाती है। कल्पना कीजिए कि 1947 में माउंटबेटन को यह पता होता कि जिन्ना गंभीर रूप से बीमार हैं और लंबे समय तक सक्रिय राजनीति में बने रहना उनके लिए संभव नहीं हो सकता। तब क्या ब्रिटिश सरकार सत्ता हस्तांतरण को कुछ महीनों के लिए टालती? संभव है। लेकिन इसके बाद क्या होता, इसका उत्तर कोई निश्चित रूप से नहीं दे सकता।

कुछ महीने की देरी और इतिहास की दूसरी संभावना

यदि सत्ता हस्तांतरण कुछ महीनों के लिए टलता, तो राजनीतिक परिस्थितियां बदल सकती थीं। जिन्ना की बीमारी अधिक गंभीर हो सकती थी। मुस्लिम लीग में नया नेतृत्व उभर सकता था। कांग्रेस और मुस्लिम लीग के बीच बातचीत का कोई नया रास्ता निकल सकता था। लेकिन इसका उलटा भी संभव था। देरी से सांप्रदायिक तनाव और बढ़ सकता था। हिंसा अधिक व्यापक हो सकती थी। ब्रिटिश प्रशासन पर नियंत्रण और कमजोर पड़ सकता था और सत्ता हस्तांतरण और भी अधिक अराजक रूप ले सकता था। इसलिए यह कहना अधिक उचित है कि जिन्ना की बीमारी की जानकारी सत्ता हस्तांतरण की रणनीति को प्रभावित कर सकती थी, लेकिन वह अकेले विभाजन को रोकने की गारंटी नहीं थी।

दो डॉक्टर और इतिहास की विडंबना

इस कहानी का सबसे दिलचस्प पहलू शायद यही है कि डॉ. पटेल और डॉ. धायबो-कू ने पाकिस्तान बनाने के लिए कोई राजनीतिक कदम नहीं उठाया था। वे चिकित्सक थे और उनके सामने एक मरीज था। उन्होंने उसकी जांच की और उसकी चिकित्सा संबंधी जानकारी को गोपनीय रखा। दशकों बाद उसी गोपनीयता को पाकिस्तान अपने राष्ट्रीय इतिहास में एक महत्वपूर्ण सेवा के रूप में देख रहा है। यानी जिन डॉक्टरों ने अपने पेशेवर कर्तव्य का पालन किया, उनकी उस समय की चुप्पी को आज एक ऐसे ऐतिहासिक प्रसंग के रूप में देखा जा रहा है जिसका संबंध भारत के विभाजन से जोड़ा जाता है।

जिन्ना की मृत्यु ने क्या बताया?

जिन्ना की बीमारी वास्तव में गंभीर थी, इसका एक स्पष्ट प्रमाण उनकी बाद की जीवन-यात्रा है। पाकिस्तान के निर्माण के लगभग एक वर्ष बाद, 11 सितंबर 1948 को जिन्ना की मृत्यु हो गई। वह पाकिस्तान के संस्थापक बने, उसके पहले गवर्नर-जनरल बने और देश बनने के बाद भी कुछ समय तक राजनीतिक रूप से सक्रिय रहे। लेकिन उनका स्वास्थ्य तेजी से गिरता गया। इस तथ्य से इतना जरूर स्पष्ट होता है कि 1946 में उनकी बीमारी को लेकर चिकित्सकों की चिंता निराधार नहीं थी। लेकिन इससे यह साबित नहीं होता कि 1947 में उनकी मृत्यु या राजनीतिक अनुपस्थिति निश्चित रूप से पाकिस्तान की स्थापना को रोक देती।

Freedom at Midnight के दावे कितने निर्णायक हैं?

इस पूरी कहानी को लोकप्रिय बनाने में Freedom at Midnight की बड़ी भूमिका है। पुस्तक ने जिन्ना की बीमारी, डॉक्टरों की गोपनीयता और माउंटबेटन के संभावित निर्णयों के बीच एक संबंध प्रस्तुत किया। लेकिन ऐतिहासिक शोध में किसी एक पुस्तक के विवरण को अंतिम प्रमाण नहीं माना जा सकता। खासकर तब, जब बाद के स्रोतों में कुछ विवरणों को लेकर मतभेद दिखाई देते हैं। इसलिए इस कहानी को पढ़ते समय दो स्तर अलग रखना जरूरी है। जिन्ना की गंभीर बीमारी और उनकी चिकित्सकीय जांच ऐतिहासिक रूप से महत्वपूर्ण तथ्य हैं। लेकिन यह निष्कर्ष कि डॉक्टरों की गोपनीयता ने सीधे तौर पर भारत का विभाजन कराया या विभाजन को रोकने का अवसर समाप्त कर दिया, एक व्याख्या है—स्थापित तथ्य नहीं।

एक मेडिकल रिपोर्ट से निकला इतिहास का सबसे बड़ा सवाल

इस पूरे प्रसंग की सबसे बड़ी दिलचस्पी इसी में है कि यह इतिहास के उस सवाल से जुड़ जाता है जिसका उत्तर कभी नहीं मिल सकता—“अगर ऐसा होता तो क्या होता?”

अगर माउंटबेटन को जिन्ना की वास्तविक बीमारी का पता होता, तो क्या वह सत्ता हस्तांतरण टालते?

अगर सत्ता हस्तांतरण टलता, तो क्या मुस्लिम लीग की राजनीति बदलती?

अगर जिन्ना राजनीतिक रूप से कमजोर पड़ते, तो क्या पाकिस्तान की मांग भी कमजोर पड़ती?

और अगर पाकिस्तान की मांग कमजोर पड़ती, तो क्या भारत एक संयुक्त संघ के रूप में स्वतंत्र होता? इनमें से किसी भी सवाल का निश्चित उत्तर इतिहास नहीं दे सकता। इतिहास में वास्तविक घटनाएं केवल उन्हीं परिस्थितियों में दर्ज होती हैं जो वास्तव में हुईं। जो नहीं हुआ, उसके बारे में हम केवल अनुमान लगा सकते हैं।

इतिहास का अनुत्तरित रहस्य

भारत का विभाजन अनेक राजनीतिक, सामाजिक और ऐतिहासिक कारणों का परिणाम था। उसे केवल जिन्ना की बीमारी या दो डॉक्टरों की गोपनीयता से समझना उचित नहीं होगा। फिर भी यह प्रसंग असाधारण है।1946 में मुंबई के दो डॉक्टरों ने जिन्ना की गंभीर बीमारी देखी। उन्होंने चिकित्सकीय गोपनीयता निभाई। 1947 में भारत का विभाजन हुआ। 1948 में जिन्ना की मृत्यु हो गई। और लगभग आठ दशक बाद पाकिस्तान ने उन दोनों डॉक्टरों को उनके उसी मौन के लिए सम्मानित करने का फैसला किया।

शायद इस कहानी का सबसे सटीक निष्कर्ष यही है कि उन डॉक्टरों ने इतिहास बदलने का प्रयास नहीं किया था। उन्होंने केवल अपने मरीज का राज़ रखा था। लेकिन इतिहास कभी-कभी सामान्य मानवीय निर्णयों को भी असाधारण अर्थ दे देता है। आज भी यह निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता कि यदि जिन्ना की बीमारी की गंभीरता 1947 में सार्वजनिक हो जाती, तो भारत का विभाजन रुक जाता। इतना जरूर कहा जा सकता है कि उस जानकारी के सामने आने से तत्कालीन राजनीतिक नेतृत्व के सामने विकल्पों का एक अलग परिदृश्य पैदा हो सकता था।

और इसी संभावना ने 1946 की एक चिकित्सकीय जांच को भारत के आधुनिक इतिहास के सबसे रोचक “क्या होता अगर?” सवालों में बदल दिया है।


ABOUT AUTHOR : Jay Singh Rawat is a veteran journalist, author and researcher with nearly five decades of experience in journalism. He has authored nine books covering history, society, tribes and journalism, including works published by the National Book Trust. He has also edited several reference books, documenting Uttarakhand’s history, culture and contemporary affairs.

 

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

error: Content is protected !!