हिमालय के भीतर विकास या जोखिम?
The recent tunnel tragedies in Sikkim and Uttarakhand have reignited concerns over the safety of large infrastructure projects in the fragile Himalayan region. While roads, railways, hydropower projects, and strategic tunnels are vital for national development and security, repeated accidents expose serious weaknesses in geological assessments, project planning, and safety standards. The article highlights Union Minister Nitin Gadkari’s repeated criticism of poor-quality Detailed Project Reports (DPRs), arguing that flawed planning often lies at the root of disasters. It calls for independent geological reviews, stronger accountability, real-time monitoring, and worker safety to ensure that development never comes at the cost of human lives.

— जयसिंह रावत
सिक्किम की तीस्ता स्टेज-6 जलविद्युत परियोजना की निर्माणाधीन सुरंग में मीथेन गैस विस्फोट से हुई बड़ी जनहानि और उत्तराखंड की सिल्क्यारा-बड़कोट सुरंग में हाल में चट्टान गिरने से एक श्रमिक की मौत ने एक बार फिर हिमालय में चल रही सुरंग परियोजनाओं की सुरक्षा पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। ये दो अलग-अलग घटनाएं नहीं हैं, बल्कि उस विकास मॉडल की चेतावनी हैं, जिसमें हिमालय के भीतर तेजी से सुरंगें तो खोदी जा रही हैं, लेकिन सुरक्षा और वैज्ञानिक तैयारी उसी गति से मजबूत होती नहीं दिख रही।
नवंबर 2023 में सिल्क्यारा सुरंग में 41 श्रमिक 17 दिनों तक फंसे रहे थे। वह देश के इतिहास का सबसे लंबा और सबसे चर्चित सुरंग बचाव अभियान था। करोड़ों लोगों की निगाहें उस अभियान पर टिकी थीं और अंततः सभी श्रमिक सुरक्षित बाहर निकाल लिए गए। उस समय उम्मीद थी कि यह दुर्घटना भविष्य के लिए सबक बनेगी। लेकिन तीन वर्ष बाद उसी परियोजना में फिर एक श्रमिक की मौत इस सवाल को और गहरा करती है कि आखिर हमने उस हादसे से सीखा क्या?
सिक्किम की दुर्घटना ने चिंता का दायरा और बढ़ा दिया है। प्रारंभिक जानकारी के अनुसार सुरंग के भीतर मीथेन गैस के कारण विस्फोट हुआ। सुरंग इंजीनियरिंग में मीथेन जैसी ज्वलनशील गैसें, विषैली गैसें, भूजल का दबाव और कमजोर चट्टानें सबसे बड़े जोखिम माने जाते हैं। इनसे निपटने के लिए गैस डिटेक्शन सिस्टम, उच्च क्षमता वाली वेंटिलेशन व्यवस्था, रियल टाइम मॉनिटरिंग, ड्रेनेज बोरहोल और आपातकालीन निकासी प्रणाली जैसी व्यवस्थाएं अंतरराष्ट्रीय मानक हैं। यदि जोखिम पहले से ज्ञात हैं, तो फिर हादसे बार-बार क्यों हो रहे हैं?
आज हिमालय देश की सबसे बड़ी भूमिगत निर्माण प्रयोगशाला बन चुका है। चारधाम ऑल वेदर परियोजना, ऋषिकेश-कर्णप्रयाग रेल लाइन, जलविद्युत परियोजनाएं, सीमा सड़क संगठन की सामरिक सड़कें और अनेक सुरंगें एक साथ निर्माणाधीन हैं। आने वाले वर्षों में सैकड़ों किलोमीटर नई सुरंगें बनने वाली हैं। ऐसे में सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि क्या हमारी योजना, इंजीनियरिंग और सुरक्षा व्यवस्था भी उतनी ही आधुनिक और भरोसेमंद है?
दरअसल, इन हादसों की जड़ तक पहुंचने के लिए केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी की वर्षों से दी जा रही चेतावनियों को गंभीरता से समझना होगा। गडकरी कई सार्वजनिक मंचों पर कह चुके हैं कि देश में बड़ी संख्या में सड़क और सुरंग परियोजनाओं की डिटेल्ड प्रोजेक्ट रिपोर्ट (डीपीआर) निम्न गुणवत्ता की होती हैं। उनके अनुसार अधूरे भू-वैज्ञानिक सर्वेक्षण, कमजोर डिजाइन और दोषपूर्ण इंजीनियरिंग के कारण परियोजनाओं में देरी होती है, लागत कई गुना बढ़ जाती है और कई बार जानलेवा दुर्घटनाएं भी होती हैं। उनका यह भी कहना रहा है कि खराब डीपीआर तैयार करने वाले सलाहकारों की जवाबदेही तय होनी चाहिए।
यदि देश के सबसे बड़े अवसंरचना मंत्री स्वयं डीपीआर की गुणवत्ता पर बार-बार सवाल उठा रहे हैं, तो हिमालय जैसी अत्यंत संवेदनशील पर्वतमाला में हर बड़ी सुरंग परियोजना की स्वतंत्र भू-वैज्ञानिक समीक्षा और थर्ड-पार्टी ऑडिट अब तक अनिवार्य क्यों नहीं बनाए गए? आखिर निर्माण शुरू होने से पहले यह सुनिश्चित क्यों नहीं किया जाता कि पहाड़ के भीतर किस प्रकार की चट्टानें, गैस, जलधाराएं और भूगर्भीय जोखिम मौजूद हैं?
हिमालय विश्व का सबसे युवा और सबसे सक्रिय पर्वत तंत्र है। यहां की चट्टानें अनेक स्थानों पर कमजोर हैं, भूकंपीय गतिविधियां लगातार जारी रहती हैं और जलवायु परिवर्तन के कारण अतिवृष्टि, भूस्खलन तथा भूगर्भीय अस्थिरता तेजी से बढ़ रही है। वैज्ञानिक लंबे समय से चेतावनी देते रहे हैं कि हिमालय में सुरंग निर्माण मैदानी क्षेत्रों की तरह नहीं किया जा सकता। यहां हर किलोमीटर की खुदाई के साथ भूगर्भीय परिस्थितियां बदल सकती हैं।
फरवरी 2021 की चमोली आपदा इसका बड़ा उदाहरण है। ऋषिगंगा और धौलीगंगा में आई विनाशकारी बाढ़ ने एनटीपीसी की तपोवन-विष्णुगाड़ परियोजना को तबाह कर दिया। निर्माणाधीन सुरंग में काम कर रहे अनेक श्रमिक और कर्मचारी मलबे तथा पानी में समा गए। लगभग 200 लोगों की मौत हुई या वे लापता हो गए। इससे पहले टिहरी बांध परियोजना के भूमिगत निर्माण के दौरान भी कई दुर्घटनाओं में श्रमिकों की जान जा चुकी है। हर हादसे के बाद जांच समितियां बनीं, मुआवजे घोषित हुए और सुरक्षा सुधारों की बातें हुईं, लेकिन हादसों की पुनरावृत्ति नहीं रुकी।
सबसे बड़ी विडंबना यह है कि हर दुर्घटना के बाद चर्चा मशीनों और बचाव अभियानों की होती है, जबकि असली कमी अक्सर परियोजना की शुरुआती योजना में छिपी होती है। यदि भू-वैज्ञानिक अध्ययन अधूरा हो, डीपीआर कमजोर हो और जोखिम का सही आकलन न किया गया हो, तो बाद में सबसे आधुनिक मशीनें भी दुर्घटनाओं को पूरी तरह नहीं रोक सकतीं। हिमालय में सुरक्षा की शुरुआत सुरंग के मुहाने से नहीं, बल्कि डीपीआर की पहली पंक्ति से होती है।
इन परियोजनाओं की सबसे बड़ी कीमत वे श्रमिक चुकाते हैं, जो आर्थिक मजबूरी में पहाड़ के भीतर दिन-रात काम करते हैं। अधिकांश श्रमिक प्रवासी और साधारण परिवारों से आते हैं। दुर्घटना के बाद मिलने वाला मुआवजा उनके परिवार का भविष्य सुरक्षित नहीं कर सकता। इसलिए सुरक्षा को खर्च नहीं, बल्कि परियोजना की पहली शर्त माना जाना चाहिए।
यह कहना उचित नहीं होगा कि हिमालय में विकास कार्य रुक जाने चाहिए। सीमांत राज्यों को बेहतर सड़कें, रेल संपर्क, सुरंगें और ऊर्जा परियोजनाएं चाहिए। राष्ट्रीय सुरक्षा और क्षेत्रीय विकास के लिए इनका महत्व निर्विवाद है। लेकिन विकास और सुरक्षा को एक-दूसरे का विकल्प नहीं बनाया जा सकता। अब समय आ गया है कि हिमालयी सुरंग परियोजनाओं के लिए अलग राष्ट्रीय सुरक्षा प्रोटोकॉल बनाया जाए। प्रत्येक डीपीआर का स्वतंत्र विशेषज्ञों से पुनर्मूल्यांकन हो, भू-वैज्ञानिक और गैस संबंधी जोखिमों की रियल टाइम निगरानी अनिवार्य हो, सुरक्षा ऑडिट सार्वजनिक किए जाएं और दुर्घटना होने पर केवल ठेकेदार ही नहीं, बल्कि डीपीआर तैयार करने वाली एजेंसी और परियोजना सलाहकारों की जवाबदेही भी तय की जाए।
सिक्किम, सिल्क्यारा, चमोली और टिहरी—ये चार नाम अलग-अलग दुर्घटनाओं के नहीं, बल्कि एक ही चेतावनी के प्रतीक हैं। यदि हम इन्हें भी संयोग मानकर आगे बढ़ते रहे, तो अगली सुरंग के मुहाने पर फिर कोई त्रासदी हमारा इंतजार कर सकती है। हिमालय के भीतर विकास अवश्य हो, लेकिन वह वैज्ञानिक समझ, पारदर्शिता और सर्वोच्च सुरक्षा मानकों पर आधारित हो। क्योंकि किसी भी राष्ट्र की प्रगति सुरंगों की संख्या से नहीं, बल्कि इस बात से मापी जानी चाहिए कि उन सुरंगों में काम करने वाला हर श्रमिक सुरक्षित अपने घर लौटे और विकास की कीमत हिमालय की नाजुक पारिस्थितिकी तथा मानव जीवन को न चुकानी पड़े।
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About author :- Jay Singh Rawat is a senior journalist, author, and independent researcher based in Dehradun, Uttarakhand. He writes extensively on the Himalayas, environment, climate change, disaster management, public policy, and regional development, contributing regularly to leading Hindi newspapers and magazines.
