बदरीनाथ धाम की गरिमा पर उठते सवाल, इतिहास से सीख लेने की जरूरत
–प्रकाश कपरुवाण की रिपोर्ट-
ज्योतिर्मठ, 20 जुलाई । सनातन धर्म के सर्वोच्च तीर्थों में शामिल श्री बदरीनाथ धाम की गरिमा को प्रभावित करने के प्रयास कोई नई बात नहीं हैं। आजादी से पहले भी मंदिर की व्यवस्थाओं और पारदर्शिता को लेकर सवाल उठे थे। इन्हीं परिस्थितियों में तत्कालीन सरकार ने बदरीनाथ धाम के महत्व को देखते हुए वर्ष 1939 में श्री बदरीनाथ मंदिर अधिनियम का विशेष राजपत्र जारी किया, जिसके आधार पर आज भी मंदिर की व्यवस्थाओं का संचालन होता है।
इतिहास के अनुसार वर्ष 1899 तक बदरीनाथ मंदिर का प्रबंधन रावल के हाथों में था, जबकि पर्यवेक्षण का अधिकार टिहरी दरबार के पास था। उस समय मंदिर की व्यवस्थाओं और तीर्थयात्रियों की सुविधाओं को लेकर असंतोष बढ़ने लगा था। प्रबंधन में मनमानी के आरोपों के बाद वर्ष 1928 में जनआंदोलन शुरू हुआ और हिन्दू धार्मिक एवं धर्मार्थ बंदोबस्ती समिति ने इस मामले को तत्कालीन संयुक्त प्रांत सरकार के समक्ष उठाया।
इसके बाद व्यापक अध्ययन और विचार-विमर्श के उपरांत वर्ष 1939 में श्री बदरीनाथ मंदिर अधिनियम लागू किया गया। बाद में वर्ष 1948 में केदारनाथ एवं अन्य सहवर्ती मंदिरों को शामिल करते हुए श्री बदरीनाथ-केदारनाथ मंदिर अधिनियम अस्तित्व में आया।
हाल के दिनों में बदरीनाथ धाम में चढ़ावे और दान से जुड़ी कथित चोरी तथा अनियमितताओं के मामलों ने गंभीर चिंताएं पैदा की हैं। इन घटनाओं ने मंदिर प्रबंधन की पारदर्शिता और जवाबदेही पर फिर से बहस छेड़ दी है। यह स्थिति धाम की प्रतिष्ठा और श्रद्धालुओं की आस्था, दोनों के लिए चिंता का विषय मानी जा रही है।
लेख में यह भी कहा गया है कि आजादी से पहले और उत्तर प्रदेश के समय में भी बदरीनाथ धाम की गरिमा बनाए रखने के लिए प्रशासनिक स्तर पर आवश्यक कदम उठाए जाते रहे। ऐसे में उत्तराखंड राज्य गठन के बाद भी धाम की प्रतिष्ठा को सर्वोच्च प्राथमिकता मिलनी चाहिए।
लेखक के अनुसार राज्य गठन के बाद बदरीनाथ-केदारनाथ मंदिर समिति का मुख्यालय धीरे-धीरे जोशीमठ से हटाकर पहले देहरादून और बाद में ऋषिकेश से संचालित किया जाने लगा, जबकि 5 मार्च 1941 के समिति प्रस्ताव के अनुसार मुख्यालय जोशीमठ में स्थापित किया गया था। उनका तर्क है कि इससे स्थानीय प्रशासनिक निगरानी कमजोर हुई और यात्रा मार्ग की व्यवस्थाओं पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ा।
हालांकि, मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने बदरीनाथ धाम में चढ़ावे और दान की कथित हेराफेरी तथा चोरी की घटनाओं को अत्यंत गंभीर बताते हुए इसे “गौहत्या जैसा पाप” करार दिया है। मामले की जांच के लिए गठित एसआईटी भी जांच में जुटी है।
लेख में यह सवाल भी उठाया गया है कि जिस धाम के दर्शन के लिए हर वर्ष लाखों श्रद्धालु पहुंचते हैं, वहां ऐसी घटनाएं क्यों सामने आ रही हैं। लेखक का मत है कि इस विषय पर गंभीर आत्ममंथन, प्रभावी प्रबंधन और पारदर्शी व्यवस्था सुनिश्चित करने की आवश्यकता है, ताकि श्रद्धालुओं की आस्था अक्षुण्ण बनी रहे।
साथ ही यह भी कहा गया है कि जांच निष्पक्ष हो, किसी निर्दोष का उत्पीड़न न हो और यदि किसी ने बदरीनाथ धाम की गरिमा को ठेस पहुंचाने या उसे विवादों में घसीटने का प्रयास किया है तो उसके विरुद्ध कठोर कार्रवाई की जानी चाहिए, ताकि भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति न हो सके।
