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सजा ए मौत – जब इन्तेहा हो गयी ! जज से छिन गयी फाइलें

उत्तर प्रदेश: 4 महीने में 22 दोषियों को फांसी की सजा देने वाले जज रवि कुमार दिवाकर से वापस ली गईं 97 फाइलें; न्यायिक करियर में दिए कुल 35 मृत्युदंड

-विशेष रिपोर्ट-

उत्तर प्रदेश की न्यायिक व्यवस्था में एक अभूतपूर्व घटनाक्रम के तहत मुजफ्फरनगर के अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश (अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश/फास्ट ट्रैक कोर्ट) रवि कुमार दिवाकर की अदालत में लंबित हत्या और अन्य गंभीर अपराधों से जुड़ी 97 फाइलों को वापस ले लिया गया है। जिला एवं सत्र न्यायाधीश बीरेंद्र कुमार सिंह के आदेश के बाद इन सभी मुकदमों की फाइलों को वापस जिला एवं सत्र न्यायालय में स्थानांतरित कर दिया गया है, ताकि कानून के अनुसार उनका निस्तारण किया जा सके।

यह प्रशासनिक कार्रवाई उन खबरों के सामने आने के तुरंत बाद हुई है, जिसमें यह तथ्य रेखांकित किया गया था कि न्यायाधीश रवि कुमार दिवाकर ने मुजफ्फरनगर में अपनी तैनाती के पिछले चार महीनों (लगभग 129 दिनों) के भीतर 10 अलग-अलग मुकदमों में 22 दोषियों को फांसी (मृत्युदंड) की सजा सुनाई थी।

करियर में कुल 35 मृत्युदंड का रिकॉर्ड

मुजफ्फरनगर में सुनाए गए 22 मृत्युदंड के फैसलों के साथ ही न्यायाधीश दिवाकर के न्यायिक करियर में अब तक दिए गए कुल फांसी के आदेशों की संख्या 35 तक पहुंच गई है। इससे पहले बरेली में अपनी तैनाती के दौरान उन्होंने 13 दोषियों को मौत की सजा सुनाई थी। हालांकि, कानून के मुताबिक किसी भी सत्र न्यायालय द्वारा दी गई मृत्युदंड की सजा तब तक निष्पादित नहीं की जा सकती जब तक कि संबंधित उच्च न्यायालय (हाईकोर्ट) द्वारा उस पर पुष्टि (Confirmation) न कर दी जाए।

कौन हैं जज रवि कुमार दिवाकर?

46 वर्षीय रवि कुमार दिवाकर ने 17 दिसंबर 2009 को मुंसिफ/सिविल जज (जूनियर डिविजन) के रूप में उत्तर प्रदेश न्यायिक सेवा में प्रवेश किया था। अपने करियर में वह आजमगढ़, सुल्तानपुर, बदायूं, वाराणसी, बरेली और चित्रकूट में कार्यरत रहे हैं।

जज दिवाकर वर्ष 2022 में उस समय राष्ट्रीय सुर्खियों में आए थे, जब वाराणसी में सिविल जज (सीनियर डिविजन) के पद पर रहते हुए उन्होंने प्रसिद्ध ज्ञानवापी मस्जिद परिसर का वीडियोग्राफिक सर्वे कराने का ऐतिहासिक आदेश दिया था।

सुरक्षा व्यवस्था पर भी खड़ा हुआ था विवाद

हाल के दिनों में जज दिवाकर अपनी सुरक्षा व्यवस्था को लेकर भी चर्चा में रहे। उन्होंने उत्तर प्रदेश के पुलिस महानिदेशक (DGP) को चार पन्नों का एक पत्र लिखकर आरोप लगाया था कि उनकी सहमति के बिना उनकी सुरक्षा में तैनात गनर को बदल दिया गया, जिसे उन्होंने गंभीर सुरक्षा चूक बताया था। इस पर पुलिस ने स्पष्टीकरण दिया था कि संबंधित पुलिसकर्मी के अवकाश पर जाने के कारण वैकल्पिक सुरक्षा प्रदान की गई थी।

जिला एवं सत्र न्यायाधीश द्वारा 97 फाइलों को वापस लेने के इस नए आदेश ने उत्तर प्रदेश के कानूनी और न्यायिक हलकों में एक नई चर्चा को जन्म दे दिया है।

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