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क्या समान नागरिक संहिता भारतीय समाज में बहिर्विवाह को बढ़ावा देगी?

 

— देवेंद्र कुमार बुडाकोटी –
उत्तराखंड उच्च न्यायालय में हाल ही में विभिन्न धार्मिक पृष्ठभूमियों से जुड़े वयस्क याचिकाकर्ताओं द्वारा दायर एक याचिका ने भारत में विवाह, परिवार और समुदाय से जुड़े एक व्यापक सामाजिक प्रश्न को सामने ला दिया है।
याचिकाकर्ताओं ने विवाह करने में सहायता की मांग की थी, क्योंकि उनके परिवार और रिश्तेदार इस संबंध का विरोध कर रहे थे और कथित रूप से उन्हें गंभीर परिणाम भुगतने की धमकियां भी दी गई थीं। न्यायालय ने संबंधित पुलिस थानों को याचिकाकर्ताओं को आवश्यक सहायता और सुरक्षा प्रदान करने के निर्देश दिए।
जाति और समुदाय से बाहर विवाह—अर्थात बहिर्विवाह (Exogamy)—अब धीरे-धीरे अधिक दिखाई देने लगा है। हालांकि, अपनी जाति, समुदाय या धर्म के भीतर विवाह—अर्थात अंतर्विवाह (Endogamy)—आज भी भारतीय समाज में प्रमुख सामाजिक मानदंड बना हुआ है। स्थापित विवाह परंपराओं से किसी भी प्रकार का विचलन अक्सर परिवार और रिश्तेदारी समूहों के कड़े विरोध का सामना करता है। कुछ मामलों में इन मान्यताओं को चुनौती देने वाले लोगों को सामाजिक बहिष्कार, पारिवारिक विवाद, कानूनी लड़ाइयों और गंभीर मानसिक तनाव तक का सामना करना पड़ता है।
न्यायालय का हस्तक्षेप प्रख्यात समाजशास्त्री आंद्रे बेटेय (Andre Beteille) की उस टिप्पणी की भी याद दिलाता है कि संविधान यह दिशा बता सकता है कि हमें किस ओर बढ़ना है, लेकिन सामाजिक संरचना यह तय करेगी कि हम कितनी दूर और किस गति से आगे बढ़ पाएंगे।
प्रवास, शहरीकरण, उच्च शिक्षा और रोजगार के बदलते स्वरूपों ने भारतीय कस्बों और शहरों के सामाजिक ताने-बाने को काफी बदला है। परिवार और रिश्तेदारी की संरचनाओं में भी महत्वपूर्ण परिवर्तन हो रहे हैं, जिसका प्रभाव विवाह की पारंपरिक अंतर्विवाही प्रवृत्तियों पर पड़ रहा है।
युवा पीढ़ी शैक्षणिक संस्थानों, कार्यस्थलों और सामाजिक परिवेश में अलग-अलग जाति, वर्ग, धर्म और जातीय पृष्ठभूमि के लोगों के साथ पहले की तुलना में कहीं अधिक संपर्क में आती है। ऐसे संपर्क स्वाभाविक रूप से मित्रता और कई बार प्रेम संबंधों को भी जन्म देते हैं। इसके बावजूद समाज के अनेक वर्गों में विरोध अब भी मजबूत है, विशेषकर तब, जब विवाह जाति, धर्म या समुदाय की निर्धारित सीमाओं को पार करता है।
भारतीय माता-पिता अक्सर अपने बच्चों के विवाह संबंधी निर्णयों में गहराई से शामिल रहते हैं, क्योंकि विवाह को केवल दो व्यक्तियों के बीच का संबंध नहीं माना जाता। परंपरागत रूप से इसे दो परिवारों और व्यापक अर्थ में दो रिश्तेदारी नेटवर्क के बीच गठबंधन के रूप में देखा जाता रहा है।
यहां एक महत्वपूर्ण प्रश्न उठता है—क्या भारत को धीरे-धीरे उन पश्चिमी समाजों की ओर देखना चाहिए, जहां सामान्यतः माता-पिता अपने बच्चों के विवाह, करियर, पारिवारिक जीवन और तलाक जैसे मामलों में अपेक्षाकृत कम हस्तक्षेप करते हैं? अथवा भारत को अपनी विशिष्ट परिवार-केंद्रित सामाजिक संरचना को बनाए रखते हुए व्यक्तियों को अपने जीवनसाथी का चयन करने की अधिक स्वतंत्रता देनी चाहिए?
भारत में माता-पिता विवाह को लेकर चिंतित रहते हैं, क्योंकि परिवार आज भी सामाजिक जीवन का केंद्र है। विवाह परिवारों और रिश्तेदारी के नेटवर्क को जोड़ता है तथा सांस्कृतिक निरंतरता बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। विवाह की परंपराएं, परिवार की संरचना, रिश्तेदारी, भाषा, परंपराएं और रीति-रिवाज ऐतिहासिक रूप से भारतीय समाज को एकजुट रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते रहे हैं।
अंतर-धार्मिक विवाह विशेष रूप से संवेदनशील विषय बने हुए हैं। ऐसे विवाहों को परिवार, रिश्तेदारों और व्यापक समुदाय के कुछ वर्गों के कड़े विरोध का सामना करना पड़ सकता है। परिवार के विरोध के बावजूद विवाह करने की इच्छा रखने वाले जोड़ों की सुरक्षा के लिए पुलिस और न्यायालयों का हस्तक्षेप भी अब अधिक दिखाई देने लगा है।
यहां एक और महत्वपूर्ण प्रश्न उठता है कि व्यक्तिगत और पारिवारिक पसंद से जुड़े विवादों में पुलिस और न्यायालयों को किस सीमा तक हस्तक्षेप करना चाहिए? इससे भी महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि क्या समान नागरिक संहिता (Uniform Civil Code—UCC) विवाह संबंधों में अधिक सामंजस्य स्थापित करने और भारतीय समाज में कठोर अंतर्विवाही प्रथाओं को धीरे-धीरे कमजोर करने में योगदान दे सकती है?
समान नागरिक संहिता व्यक्तिगत कानून के कुछ पहलुओं के लिए एक समान कानूनी ढांचा उपलब्ध करा सकती है, लेकिन विवाह से जुड़ी सामाजिक प्रथाओं में बदलाव केवल कानून बनाने से संभव नहीं है। सामाजिक दृष्टिकोण, पारिवारिक संरचनाएं, जातिगत पहचान, धार्मिक विश्वास और सामुदायिक मान्यताएं भारतीय समाज में गहराई से जड़ें जमाए हुए हैं। कानून अधिकार और सुरक्षा प्रदान कर सकता है, लेकिन सामाजिक परिवर्तन की प्रक्रिया अक्सर इससे कहीं अधिक समय लेती है।
इसलिए वास्तविक प्रश्न शायद यह नहीं है कि क्या केवल समान नागरिक संहिता बहिर्विवाह को बढ़ावा दे सकती है। असली प्रश्न यह है कि क्या बदलता हुआ भारतीय समाज विवाह में अधिक व्यक्तिगत स्वतंत्रता को स्वीकार करने के लिए तैयार है और साथ ही उन सामाजिक एवं सांस्कृतिक संबंधों को भी बनाए रख सकता है, जिन्होंने परंपरागत रूप से परिवारों और समुदायों को एकजुट रखा है?
यही वह संतुलन है, जिसके बीच भारत में विवाह, परिवार, व्यक्तिगत स्वतंत्रता और सामाजिक परंपराओं का भविष्य तय होगा।
लेखक समाजशास्त्री हैं और जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU), नई दिल्ली के पूर्व छात्र हैं। उनके शोध का उल्लेख नोबेल पुरस्कार विजेता प्रो. अमर्त्य सेन की पुस्तकों में किया गया है।

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