ट्रंप ईरान वार्ता को लेकर बड़े-बड़े दावे कर रहे हैं, लेकिन ईरान लगातार उनका खंडन कर रहा है
क्या सार्वजनिक बयानबाजी अमेरिका-ईरान समझौते को पटरी से उतार देगी?
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अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप एक बार फिर ईरान के साथ चल रही परमाणु वार्ताओं को लेकर बड़े दावे कर रहे हैं। उनका कहना है कि ईरान ने भविष्य में “अनंत काल तक” उच्च स्तरीय परमाणु निरीक्षणों की अनुमति देने पर सहमति व्यक्त कर दी है। लेकिन ईरान ने ट्रंप के इस दावे का तुरंत खंडन कर दिया है।
ट्रंप ने सोशल मीडिया पर दावा किया कि अमेरिकी वार्ताकारों ने ईरान से यह महत्वपूर्ण रियायत हासिल की है। हालांकि उन्होंने यह नहीं बताया कि परमाणु अप्रसार संधि (NPT) का हस्ताक्षरकर्ता होने के नाते ईरान पहले से ही अंतरराष्ट्रीय निरीक्षणों की अनुमति देने के लिए बाध्य है।
दूसरी ओर ईरानी अधिकारियों का कहना है कि अमेरिका द्वारा एक वर्ष पहले बमबारी किए गए इस्फहान, नतांज और फोर्दो जैसे प्रमुख परमाणु स्थलों पर निरीक्षकों को प्रवेश देने की कोई तत्काल योजना नहीं है।
जमे हुए धन और अमेरिकी कृषि उत्पादों पर भी विवाद
अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने दावा किया कि ईरान ने सहमति दी है कि यदि उसके जमे हुए विदेशी धन को मुक्त किया जाता है तो उसकी निगरानी अमेरिका और कतर के अधिकारी करेंगे तथा इस धन का उपयोग अमेरिकी कृषि उत्पाद खरीदने में किया जाएगा।
ईरान ने इस दावे को भी नकार दिया।
ईरान के केंद्रीय बैंक के गवर्नर अब्दुलनासिर हेम्मती ने स्पष्ट कहा कि हस्ताक्षरित समझौता ज्ञापन में अमेरिकी कृषि उत्पाद खरीदने की कोई बाध्यता नहीं है। हालांकि उन्होंने यह संभावना खुली छोड़ी कि इस विषय पर कोई मौखिक सहमति हुई हो सकती है।
ईरान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता इस्माइल बघाई ने कहा कि मुक्त कराई गई संपत्तियों का उपयोग किस प्रकार किया जाएगा, इसका निर्णय केवल ईरान करेगा।
“जब तक सब तय न हो, तब तक कुछ भी तय नहीं”
अंतरराष्ट्रीय कूटनीति का एक पुराना सिद्धांत रहा है कि अंतिम समझौते से पहले किसी भी बिंदु को अंतिम नहीं माना जाता। अमेरिका और ईरान ने अतीत में इसी सिद्धांत के तहत वार्ताएं की थीं।
लेकिन वर्तमान वार्ताओं में स्थिति अलग दिखाई दे रही है। ट्रंप लगातार संभावित समझौतों को ऐसे प्रस्तुत कर रहे हैं मानो वे पहले ही अंतिम रूप ले चुके हों। ऐसा प्रतीत होता है कि वे सार्वजनिक दबाव बनाकर ईरान को उन शर्तों से पीछे हटने से रोकना चाहते हैं।
ईरान ने भी इसका जवाबी तरीका अपना लिया है। वह अमेरिकी दावों का तत्काल और सार्वजनिक रूप से खंडन कर देता है ताकि किसी दबाव में न आए।
दोनों पक्ष अपनी-अपनी कहानी गढ़ रहे हैं
वाशिंगटन स्थित थिंक टैंक ब्रुकिंग्स इंस्टीट्यूशन की विदेश नीति विशेषज्ञ सुजैन मलोनी के अनुसार, अमेरिका और ईरान दोनों ही जनमत को प्रभावित करने और वार्ता की दिशा अपने पक्ष में मोड़ने के लिए सार्वजनिक बयानबाजी कर रहे हैं।
उनका कहना है कि इन विरोधाभासी बयानों से यह स्पष्ट होता है कि अभी तक वास्तव में बहुत कम बातों पर सहमति बनी है और दोनों पक्षों के बीच अभी भी बड़ा अंतर मौजूद है।
निरीक्षणों पर क्या हुआ?
सूत्रों के अनुसार, स्विट्जरलैंड में हुई हालिया वार्ता में अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) के महानिदेशक राफेल ग्रोसी भी मौजूद थे। उन्होंने दोनों पक्षों के साथ चर्चा की कि निरीक्षण दलों को किस प्रकार की पहुंच चाहिए ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि परमाणु सामग्री का उपयोग हथियार बनाने में न हो।
बताया जाता है कि ईरान ने व्यापक निरीक्षण की अवधारणा पर सिद्धांततः सहमति दिखाई है, लेकिन उसने निरीक्षण की तिथियों और तकनीकी विवरणों को अन्य मुद्दों—विशेषकर जमे हुए अरबों डॉलर की संपत्तियों की रिहाई—से जोड़ दिया है।
ट्रंप और रूबियो की प्रतिक्रिया
जब ईरान ने निरीक्षणों को लेकर अमेरिकी दावों का खंडन किया तो ट्रंप ने चेतावनी दी कि यदि निरीक्षण नहीं होंगे तो कोई समझौता भी नहीं होगा।
अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने अपेक्षाकृत संतुलित प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि अमेरिका जानता है कि ईरान ने किस बात पर सहमति व्यक्त की है और अब यह देखना होगा कि वह उसे लागू करता है या नहीं।
जल्दबाजी में हो रही है वार्ता
2015 के परमाणु समझौते में अमेरिकी टीम के प्रमुख प्रतिबंध विशेषज्ञ रहे रिचर्ड नेफ्यू का मानना है कि वर्तमान वार्ताएं अत्यधिक जल्दबाजी में संचालित की जा रही हैं।
उनके अनुसार इसकी एक वजह होरमुज जलडमरूमध्य में जहाजरानी को सामान्य बनाना है, जबकि दूसरी वजह ट्रंप की अधीरता है। यदि उनके दूत जल्दी ठोस परिणाम नहीं दिखा पाए तो ट्रंप का धैर्य जवाब दे सकता है।
नेफ्यू का कहना है कि दोनों पक्ष मूलभूत मुद्दों पर सहमत नहीं हैं और सार्वजनिक बयानों के माध्यम से मतभेदों को छिपाने की कोशिश कर रहे हैं।
घरेलू राजनीति भी बड़ी बाधा
ईरानी वार्ताकारों को अपने देश के कट्टरपंथी धड़ों का सामना करना पड़ रहा है, जो अमेरिका के साथ किसी भी प्रकार के समझौते का विरोध करते हैं। सर्वोच्च नेता अयातुल्ला मोजतबा खामेनेई भी पहले अमेरिका के साथ समझौते को लेकर संदेह व्यक्त कर चुके हैं।
इसलिए ईरानी अधिकारियों के लिए अमेरिकी दावों को कमतर दिखाना या उनका खंडन करना राजनीतिक रूप से आवश्यक हो जाता है।
क्या समझौता खतरे में पड़ सकता है?
विशेषज्ञों का मानना है कि कूटनीतिक वार्ताओं में कुछ हद तक बयानबाजी सामान्य है, लेकिन यदि दोनों पक्ष लगातार सार्वजनिक रूप से एक-दूसरे का विरोध करते रहे तो इससे पूरी वार्ता प्रक्रिया पटरी से उतर सकती है।
विडंबना यह है कि अमेरिका और ईरान दोनों देशों में ऐसे प्रभावशाली समूह मौजूद हैं जो किसी भी समझौते का विरोध करते हैं। यदि सार्वजनिक विवाद बढ़ते गए तो उन्हें समझौता विफल करने का अवसर मिल सकता है।
वार्ता अभी बेहद नाजुक दौर में
अमेरिका और ईरान के बीच चल रही वार्ता अभी बेहद नाजुक दौर में है। ट्रंप प्रशासन जहां संभावित उपलब्धियों को पहले से घोषित कर राजनीतिक लाभ लेने की कोशिश कर रहा है, वहीं ईरान घरेलू दबावों के कारण हर दावे को सावधानीपूर्वक चुनौती दे रहा है। निरीक्षण, जमे हुए धन की रिहाई और प्रतिबंधों में राहत जैसे मुद्दों पर अभी अंतिम सहमति नहीं बनी है। ऐसे में यह स्पष्ट है कि शांति और परमाणु समझौते की राह अभी लंबी, कठिन और अनिश्चित बनी हुई है।
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David E. Sanger has covered five American presidents and covered efforts to keep Iran from obtaining nuclear weapons. He reported from Washington Yeganeh Torbati covers Iran and reported from Istanbul
