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उपभोक्ता आयोगों में घट रहे मामले, दस साल पुराने केस भी लंबित

तीन से पांच माह में निपटारे का प्रावधान, राज्य और जिला आयोगों में हजारों मामले फैसले के इंतजार में

 

काशीपुर,1 7  सितम्बर। उपभोक्ताओं को शीघ्र और सुलभ न्याय दिलाने के लिए बने उपभोक्ता संरक्षण कानून के बावजूद उत्तराखंड के उपभोक्ता आयोगों में बड़ी संख्या में मामले वर्षों से लंबित हैं। कानून में सामान्यतः तीन माह और प्रयोगशाला जांच वाले मामलों में पांच माह में निपटारे का प्रावधान है, लेकिन राज्य और जिला उपभोक्ता आयोगों में दस वर्ष से अधिक पुराने मामले भी फैसले की प्रतीक्षा कर रहे हैं। दूसरी ओर, हाल के वर्षों में आयोगों में नए मामले दाखिल होने की संख्या में भी उल्लेखनीय कमी दर्ज की गई है।

काशीपुर के सूचना अधिकार कार्यकर्ता नदीम उद्दीन ने उत्तराखंड राज्य उपभोक्ता आयोग से राज्य एवं जिला आयोगों में मामलों के निपटारे और लंबित प्रकरणों की जानकारी मांगी थी। राज्य आयोग की लोक सूचना अधिकारी एवं प्रशासनिक अधिकारी वंदना शर्मा द्वारा उपलब्ध कराई गई सूचना के अनुसार अप्रैल 2026 के प्रारंभ में राज्य आयोग में 701 प्रथम अपीलें लंबित थीं, जबकि प्रदेश के 13 जिला उपभोक्ता आयोगों में 3,127 उपभोक्ता मामले लंबित थे।

राज्य आयोग में लंबित प्रथम अपीलों में 27 मामले दस वर्ष से अधिक पुराने हैं। इसके अलावा 125 मामले दस वर्ष, 148 सात वर्ष, 201 पांच वर्ष, 36 तीन वर्ष और 32 मामले दो वर्ष पुराने हैं। 68 मामले छह माह से एक वर्ष और 65 मामले छह माह से कम समय से लंबित हैं।

राज्य आयोग में लंबित मूल उपभोक्ता परिवादों में भी नौ मामले दस वर्ष से अधिक पुराने हैं। 22 मामले दस वर्ष, पांच मामले सात वर्ष, तीन मामले तीन वर्ष और एक मामला दो वर्ष पुराना है। तीन मामले छह माह से एक वर्ष तथा तीन मामले छह माह से कम समय से लंबित बताए गए हैं।

जिला उपभोक्ता आयोगों की स्थिति भी इससे अलग नहीं है। राज्य के 13 जिलों में लंबित मामलों में 26 दस वर्ष से अधिक, 62 दस वर्ष, 217 सात वर्ष, 647 पांच वर्ष, 718 तीन वर्ष और 675 मामले दो वर्ष पुराने हैं। इसके अलावा 409 मामले छह माह से एक वर्ष और 362 मामले छह माह से कम अवधि से लंबित हैं।

आरटीआई से प्राप्त वर्षवार आंकड़े आयोगों में नए मामले दाखिल होने में गिरावट की ओर भी संकेत करते हैं। वर्ष 2016 में राज्य आयोग में 292 और जिला आयोगों में 1,462 मामले दाखिल हुए थे। 2019 में यह संख्या क्रमशः 468 और 1,365 रही। वर्ष 2022 में राज्य आयोग में 322 और जिला आयोगों में 1,859 मामले आए, लेकिन 2023 में संख्या घटकर क्रमशः 116 और 970 रह गई।

वर्ष 2024 में इसमें और तेज गिरावट आई और राज्य आयोग में केवल 29 तथा जिला आयोगों में 574 मामले दाखिल हुए। वर्ष 2025 में यह संख्या क्रमशः 134 और 776 रही। अप्रैल 2026 तक राज्य आयोग में 58 और जिला आयोगों में 311 नए मामले दर्ज हुए थे।

राज्य आयोग के गठन से 31 मार्च 2026 तक दर्ज मामलों का क्षेत्रवार विश्लेषण बताता है कि बीमा से जुड़े विवाद सबसे अधिक रहे। बीमा संबंधी 130 मूल परिवाद और 2,261 अपीलें दाखिल हुईं। बैंकिंग क्षेत्र से 27 परिवाद और 566 अपीलें, जबकि विद्युत से संबंधित आठ परिवाद और 391 प्रथम अपीलें दर्ज हुईं।

निजी सोसाइटियों और बिल्डरों से संबंधित 67 परिवाद एवं 186 अपीलें, चिकित्सा लापरवाही से जुड़े 41 परिवाद एवं 207 अपीलें और शिक्षा से संबंधित 13 परिवाद एवं 189 अपीलें दाखिल हुईं। खराब घरेलू सामान से संबंधित एक परिवाद और 201 अपीलें दर्ज हुईं। डाक सेवाओं से जुड़ी 151, दूरसंचार से 141, रेलवे से 31, सड़क परिवहन से 23 और एयरलाइंस से संबंधित 17 प्रथम अपीलें भी राज्य आयोग तक पहुंचीं।

सूचना से सामने आए आंकड़े एक ओर बड़ी संख्या में पुराने मामलों के लंबित रहने और दूसरी ओर हाल के वर्षों में नए मामलों की संख्या घटने की तस्वीर पेश करते हैं। सूचना मांगने वाले नदीम उद्दीन का कहना है कि उपभोक्ता कानून में शीघ्र न्याय का प्रावधान होने के बावजूद लंबे समय तक मामलों का निस्तारण न होना उपभोक्ताओं के आयोगों तक पहुंचने में कमी का एक कारण हो सकता है।

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