आस्था पर डकैती: मंदिरों का अकूत वैभव और व्यवस्थागत खयानत
In this article, Jaysingh Rawat laments the deep betrayal of Hindu devotees’ faith through rampant corruption in sacred temples. Millions of pilgrims offer hard-earned donations to places like Badrinath and Ayodhya, viewing them as divine trust. Yet, these funds are systematically siphoned by temple authorities and trustees — the very “protectors” turned predators — through land grabs, theft, and misappropriation. Rawat exposes the opulent lifestyles of mahants amid vast temple wealth, historical scams, and systemic failures in governance. He demands independent CAG-style audits, severe punishment for religious fraud, and mandatory allocation of funds for education, healthcare, and public welfare to restore sanctity and accountability in Sanatan institutions.

–जयसिंह रावत –
भारतीय संस्कृति में दान और समर्पण की परंपरा केवल एक भौतिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि आत्मा की शुद्धि और परम पावन आध्यात्मिक त्याग का प्रतीक है। देश के सुदूर कोनों से आने वाले करोड़ों श्रद्धालु, जिनमें से अधिकांश अपनी गाढ़ी कमाई का एक-एक पैसा बचाकर, पेट काटकर और अपनी मूलभूत आवश्यकताओं से समझौता करके बद्रीनाथ, अयोध्या, तिरुपति या काशी जैसे पावन धामों में श्रद्धा की पूंजी अर्पित करते हैं। वे इसे ‘ईश्वर की अमानत’ मानते हैं और इसी विश्वास के साथ तिजोरी में डाल देते हैं। लेकिन जब इसी अमानत में सुनियोजित खयानत की खबरें सामने आती हैं, चाहे वह अयोध्या में जमीन दान राशि की हेराफेरी हो या वैकुंठ धाम के नाम से विख्यात बद्रीनाथ मंदिर में दान राशि की चोरी और संपत्तियों पर अवैध अतिक्रमण के मामले हों । ये घटनाएं आम श्रद्धालु के मानस पटल पर एक गहरा वज्रपात जैसा होता है। यह कोई साधारण चोरी, हेराफेरी या वित्तीय गबन का मामला नहीं है, बल्कि करोड़ों सनातनियों की सामूहिक चेतना और उनकी अटूट आस्था पर सीधी डकैती है
अमानत में खयानत: जब रक्षक ही भक्षक बने
अभी अयोध्या की दान चोरी का बबाल उछल ही रहा था किबद्रीनाथ मंदिर में भी दान राशि की हेराफेरी की चर्चाओं ने हिन्दू जनमानस को झकझोर दिया। हालाँकि बद्रीनाथ में भी इस चोरी की जांच के लिए समिति का गठन हो चुका है, लेकिन केवल जांच इन जघन्य पतित घटनाओं का निवारण नहीं है। इस पूरे परिदृश्य का सबसे स्याह, मर्मांतक और चिंताजनक पहलू यह है कि इस खयानत को अंजाम देने वाले चेहरे कोई ‘गैर’ नहीं हैं। ये वे लोग नहीं हैं जो किसी अन्य संस्कृति या धर्म से ताल्लुक रखते हों, बल्कि ये स्वयं को सनातनी कहने वाले, माथे पर तिलक लगाने वाले, मंत्रोच्चार करने वाले और वे लोग हैं जिन्हें समाज ने भगवान की सेवा और उनकी पावन संपत्तियों की रखवाली का पवित्र जिम्मा सौंपा था। यह स्थिति सीधे तौर पर चोरों को ही तिजोरी की चाबी सौंपने जैसी है। अयोध्या से लेकर बद्रीनाथ तक, संपत्तियों को हड़पने, उन्हें कौड़ियों के भाव लीज पर देने या अंदरखाने खुर्द-बुर्द करने का खेल नया नहीं है। बद्रीनाथ धाम की बेशकीमती जमीनें और अचल संपत्तियां देश के कोने-कोने में फैली हुई हैं, जिन पर या तो स्थानीय रसूखदारों ने अवैध कब्जे कर रखे हैं या फिर मंदिर प्रबंधन से जुड़े लोगों की मिलीभगत से उन्हें दबा दिया गया है। जब मंदिर की चौखट पर बैठा रक्षक ही भक्षक की भूमिका में आ जाए, तो व्यवस्था की आत्मा का मर जाना निश्चित है।
अकूत संपत्तियां और विलासिता का अंतहीन जाल
भारत के प्रमुख मंदिरों के पास जो वैभव और सोने का अकूत भंडार है, वह किसी भी देश की अर्थव्यवस्था को नई दिशा देने का माद्दा रखता है। केरल के श्री पद्मनाभस्वामी मंदिर के गुप्त तहखानों से निकले खजाने का मूल्य डेढ़ लाख करोड़ रुपये से अधिक आंका गया, जबकि इसका वास्तविक वैश्विक बाजार मूल्य इससे कई गुना ज्यादा हो सकता है। तिरुपति बालाजी, शिर्डी साईं बाबा और माता वैष्णो देवी जैसे दरबारों में हर साल अरबों रुपये का चढ़ावा और टन के हिसाब से सोना-चांदी आता है। प्रश्न यह उठता है कि जिस देश के आराध्य इतने संपन्न हैं, उस देश का एक बड़ा हिस्सा आज भी बुनियादी शिक्षा, स्वास्थ्य और सम्मानजनक जीवन के लिए क्यों तरस रहा है?
इस अकूत संपदा के रखवाले आज किस हाल में हैं? देश के कई सिद्ध पीठों, मठों और बड़े मंदिरों के महंतों, पुजारियों और मठाधीशों की जीवनशैली किसी कॉर्पोरेट सम्राट या राजा-महाराजा से कम नहीं है। आलीशान गाड़ियां, भव्य बंगले और उनके परिवारों का वैभवपूर्ण विलासी जीवन सीधे तौर पर उस आस्था की पूंजी की बदौलत है, जो श्रद्धालुओं ने भगवान के चरणों में लोक-कल्याण के भाव से अर्पित की थी। यह चारित्रिक पतन की पराकाष्ठा है।
चोरी और हेराफेरी के कुछ अन्य ऐतिहासिक प्रसंग
यदि हम इतिहास और समसामयिक घटनाओं पर दृष्टि डालें, तो अयोध्या और बद्रीनाथ के ये हालिया विवाद कोई एकाकी घटनाएं नहीं हैं। देश के धार्मिक इतिहास में पवित्रता की आड़ में भ्रष्टाचार के अनगिनत खेल खेले गए हैं। तमिलनाडु और आंध्र प्रदेश के कई प्राचीन और ऐतिहासिक मंदिरों से करोड़ों रुपये की प्राचीन और अष्टधातु की मूर्तियां अंतरराष्ट्रीय तस्करों के हाथों बेच दी गईं, और जांच में पाया गया कि इनमें खुद मंदिर के प्रशासनिक अधिकारियों और अंदरूनी सेवादारों की प्रत्यक्ष संलिप्तता थी।
ओडिशा के जगन्नाथ पुरी मंदिर के ‘रत्न भंडार’ की मूल चाबियों का रहस्यमयी तरीके से खो जाना और उसकी संपत्तियों के आधिकारिक ऑडिट को लेकर सालों तक चला राजनीतिक-प्रशासनिक गतिरोध किसी से छिपा नहीं है। कई बड़े मंदिरों में सोने की पॉलिश करने, पुराने आभूषणों को पिघलाने या शुद्धता की जांच के नाम पर वजन में भारी हेराफेरी के मामले लगातार सामने आते रहे हैं, जो यह साबित करते हैं कि जहां पारदर्शिता का अभाव है, वहां भ्रष्टाचार की जड़ें बेहद गहरी हो चुकी हैं।
व्यवस्थागत खामियां और सुधार की तात्कालिक आवश्यकता
इस नैतिक और प्रशासनिक पतन के मूल में मुख्य रूप से दो कारण हैं। पहला, सरकारों की दोहरी नीतियां जहां वे केवल कुछ मंदिरों के राजस्व और प्रशासनिक नियंत्रण पर अपना एकाधिकार बनाए रखती हैं, और कई बार इस धन का उपयोग गैर-धार्मिक या प्रशासनिक फिजूलखर्ची में होता है। दूसरा, जिन मंदिरों का नियंत्रण पूरी तरह से निजी हाथों, पारंपरिक परिवारों या ट्रस्टों के पास है, वहां आंतरिक लोकतंत्र और जवाबदेही का पूर्ण अभाव है। वहां मंदिर को एक ‘जागीर’ की तरह चलाया जाता है, जहां किसी बाहरी निष्पक्ष ऑडिट की अनुमति नहीं होती। इस दोहरे संकट ने मंदिरों को पवित्रता के केंद्र के बजाय वित्तीय मलाई काटने के अड्डों में तब्दील कर दिया है।
ठोस समाधान और भविष्य की राह
यदि सनातन समाज को अपनी इन पावन संस्थाओं की साख और पवित्रता को अक्षुण्ण रखना है, तो अब केवल आत्मग्लानि से काम नहीं चलेगा। इसके लिए कुछ बेहद कड़े और क्रांतिकारी कदम उठाने होंगे। सबसे पहले, देश के हर छोटे-बड़े सरकारी या निजी मंदिर ट्रस्ट का सालाना कैग की तर्ज पर एक स्वतंत्र, निष्पक्ष और पारदर्शी ऑडिट होना अनिवार्य किया जाना चाहिए, जिसकी रिपोर्ट आम जनता और श्रद्धालुओं के लिए सार्वजनिक डोमेन में उपलब्ध हो।
दूसरा, जो लोग धर्म की आड़ में, ईश्वर के कोष से चोरी या हेराफेरी करते हैं, उनके इस कृत्य को साधारण चोरी न मानकर ‘महापाप और राष्ट्रद्रोह’ की श्रेणी में रखा जाना चाहिए और इसके लिए त्वरित अदालत के माध्यम से कठोरतम दंड का प्रावधान हो। अंततः, मंदिर की आय का एक बड़ा और निश्चित हिस्सा अनिवार्य रूप से विश्वस्तरीय गुरुकुलों की स्थापना, निशुल्क चिकित्सालयों, अनाथालयों, आधुनिक शोध संस्थानों और प्राकृतिक आपदा प्रबंधन कोष में जाना चाहिए। तभी ‘मानव सेवा ही माधव सेवा’ का मूल संकल्प सार्थक हो सकेगा। समय आ गया है कि समाज इस धार्मिक डकैती के खिलाफ मुखर हो, अन्यथा भव्य पत्थरों के ऊंचे मंदिर तो खड़े रहेंगे, लेकिन जिस आस्था की नींव पर वे टिके हैं, वह भीतर से पूरी तरह खोखली हो जाएगी।
(लेखक परिचय : जयसिंह रावत एक वरिष्ठ पत्रकार और लेखक हैं। देहरादून में रहते हुए 1978 से पूर्णकालिक पत्रकारिता में सक्रिय, उन्होंने 48 वर्षों का अनुभव हासिल किया है। उन्होंने 9 पुस्तकें लिखी हैं, जिनमें राष्ट्रीय पुस्तक ट्रस्ट द्वारा प्रकाशित 2 किताबें शामिल हैं।लेख में प्रकट विचार उनके निजी हैं –एडमिन )
