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चिकित्सा विज्ञान के लिए अत्यंत दुर्लभ -एक साथ 4 बच्चों को दिया महिला ने जन्म

मुरादाबाद, 16 मई। उत्तर प्रदेश के संभल जिले की एक महिला ने चिकित्सा विज्ञान के लिए अत्यंत दुर्लभ माने जाने वाले मामले में पांच दिनों के अंतराल में चार बच्चों को जन्म दिया। यह प्रसव सामान्य डिलीवरी के माध्यम से मुरादाबाद के एक निजी अस्पताल में हुआ। हालांकि जन्म लेने वाले पहले शिशु की बाद में मृत्यु हो गई। यह मामला चिकित्सकीय जगत में इसलिए चर्चा का विषय बना हुआ है क्योंकि सामान्यतः एक ही गर्भावस्था में सभी शिशुओं का जन्म कुछ मिनटों या घंटों के भीतर हो जाता है, जबकि यहां प्रसव प्रक्रिया को चिकित्सकों ने जानबूझकर नियंत्रित करते हुए कई दिनों तक आगे बढ़ाया।
अस्पताल से मिली जानकारी के अनुसार महिला अमीना, जिनकी आयु लगभग तीस वर्ष बताई गई है, ने सबसे पहले 9 मई को लगभग 710 ग्राम वजन वाले एक बालक को जन्म दिया। इसके बाद अगले पांच दिनों में दो कन्याओं और एक अन्य बालक का जन्म हुआ। अस्पताल प्रशासन के अनुसार पहला नवजात अत्यधिक कम वजन और समय से पहले जन्म लेने के कारण जीवित नहीं रह सका। शेष तीन नवजातों में से एक की स्थिति स्थिर बताई जा रही है, जबकि दो अन्य को विशेष नवजात चिकित्सा इकाई में निगरानी में रखा गया है।
चिकित्सकों ने बताया कि गर्भावस्था के शुरुआती चरण में ही महिला के गर्भ में चार भ्रूण होने की पुष्टि हो गई थी। ऐसे मामलों को चिकित्सा विज्ञान में “क्वाड्रुपलेट प्रेग्नेंसी” कहा जाता है। यह अत्यंत उच्च जोखिम वाली गर्भावस्था मानी जाती है। अनुमानतः प्राकृतिक रूप से चार भ्रूण वाली गर्भावस्था लाखों प्रसवों में किसी एक में देखने को मिलती है। आधुनिक प्रजनन तकनीकों और हार्मोन उपचार के बाद ऐसे मामलों की संख्या बढ़ी है, लेकिन सामान्य परिस्थितियों में यह अब भी अत्यंत दुर्लभ है।
क्यों था यह मामला इतना जटिल
डॉक्टरों के अनुसार महिला पूरी गर्भावस्था के दौरान उच्च रक्तचाप और यकृत संबंधी जटिलताओं से भी पीड़ित रही। ऐसे मामलों में मां और बच्चों दोनों की जान को खतरा बना रहता है। समय से पहले प्रसव, अत्यधिक कम जन्म वजन, संक्रमण, फेफड़ों का अपर्याप्त विकास और मस्तिष्क संबंधी जटिलताएं प्रमुख खतरे माने जाते हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि सामान्य गर्भावस्था लगभग 37 से 40 सप्ताह की होती है, लेकिन चार भ्रूण वाले मामलों में अक्सर 28 से 32 सप्ताह के बीच ही प्रसव हो जाता है। समय से पूर्व जन्म लेने वाले बच्चों का वजन प्रायः बहुत कम होता है। 710 ग्राम वजन वाले शिशु को चिकित्सा दृष्टि से “अत्यंत कम जन्म वजन” श्रेणी में रखा जाता है। ऐसे नवजातों को सांस लेने, शरीर का तापमान बनाए रखने और संक्रमण से लड़ने में गंभीर कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है।
पांच दिनों तक कैसे टाला गया प्रसव
रिपोर्ट के अनुसार प्रसव पीड़ा 8 मई को शुरू हो गई थी, लेकिन चिकित्सकों ने पहले बच्चे के जन्म के बाद शेष भ्रूणों के प्रसव को कुछ समय तक रोकने का निर्णय लिया। चिकित्सा विज्ञान में इसे “डिलेड इंटरवल डिलीवरी” कहा जाता है। यह तकनीक अत्यंत दुर्लभ परिस्थितियों में अपनाई जाती है, जिसमें पहले बच्चे के जन्म के बाद गर्भ में मौजूद अन्य भ्रूणों को अधिक समय तक विकसित होने का अवसर देने की कोशिश की जाती है।
इस प्रक्रिया में मां को निरंतर चिकित्सकीय निगरानी में रखा जाता है। संक्रमण रोकने, गर्भाशय संकुचन नियंत्रित करने और भ्रूणों के विकास को कुछ समय तक जारी रखने के लिए विशेष दवाएं दी जाती हैं। हालांकि यह पद्धति जोखिमपूर्ण होती है और हर मामले में सफल नहीं मानी जाती।
भारत में नवजात स्वास्थ्य की चुनौती
भारत में समय से पहले जन्म लेने वाले बच्चों की संख्या दुनिया में सबसे अधिक मानी जाती है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार समयपूर्व जन्म नवजात मृत्यु का एक प्रमुख कारण है। ग्रामीण और आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों में उच्च जोखिम वाली गर्भावस्था का समय पर पता न चल पाने से खतरा और बढ़ जाता है।
विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसी गर्भावस्थाओं में नियमित अल्ट्रासाउंड जांच, पोषण, रक्तचाप की निगरानी और नवजात गहन चिकित्सा सुविधाओं की उपलब्धता जीवन रक्षक साबित होती है। यह मामला आधुनिक प्रसूति विज्ञान की जटिलताओं और चिकित्सकीय टीम की चुनौतीपूर्ण भूमिका दोनों को सामने लाता है।

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