26 मई तक केरल पहुंच सकता है मानसून, सामान्य तिथि से पहले दस्तक के संकेत

नई दिल्ली 16 मई। भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (आईएमडी) ने अनुमान जताया है कि इस वर्ष दक्षिण-पश्चिम मानसून 26 मई तक केरल पहुंच सकता है। सामान्यतः मानसून एक जून के आसपास केरल में प्रवेश करता है, लेकिन इस बार इसके समय से पहले आने की संभावना व्यक्त की गई है। आईएमडी के अनुसार अनुमान में लगभग चार दिन आगे-पीछे होने की संभावना रहती है।
मौसम विभाग ने कहा कि पिछले 21 वर्षों में केरल में मानसून आगमन की उसकी परिचालन भविष्यवाणियां अधिकांशतः सही साबित हुई हैं। केवल वर्ष 2015 में अनुमान पूरी तरह सटीक नहीं रहा था। विभाग ने बताया कि केरल में मानसून का आगमन भारतीय मुख्य भूमि पर वर्षा ऋतु की औपचारिक शुरुआत माना जाता है और यह गर्मी से वर्षा ऋतु में परिवर्तन का महत्वपूर्ण संकेतक होता है।
पिछले वर्ष 2025 में मानसून 24 मई को केरल पहुंच गया था, जो सामान्य तिथि से लगभग आठ दिन पहले था। हालांकि मौसम वैज्ञानिकों का कहना है कि मानसून का जल्दी या देर से पहुंचना पूरे देश में चार महीने की कुल वर्षा की मात्रा से सीधे तौर पर जुड़ा नहीं होता।
आईएमडी ने पहले ही इस वर्ष देश के कई हिस्सों में सामान्य से कम वर्षा की आशंका जताई है। इसके पीछे अल नीनो जैसी समुद्री परिस्थितियों को प्रमुख कारण माना जा रहा है। इसके बावजूद विभाग ने कहा है कि दक्षिण बंगाल की खाड़ी, अंडमान सागर तथा अंडमान-निकोबार द्वीप समूह के आसपास मानसून की प्रगति के लिए परिस्थितियां अनुकूल बन रही हैं।
मौसम विभाग वर्ष 2005 से केरल में मानसून आगमन की परिचालन भविष्यवाणी जारी कर रहा है। इसके लिए स्वदेशी सांख्यिकीय मॉडल का उपयोग किया जाता है, जिसमें औसतन चार दिन तक की त्रुटि संभव मानी जाती है।
आईएमडी के अनुसार मानसून आगमन का अनुमान लगाने के लिए छह प्रमुख मौसमीय संकेतकों का अध्ययन किया जाता है। इनमें उत्तर-पश्चिम भारत का न्यूनतम तापमान, दक्षिणी प्रायद्वीपीय भारत में प्री-मानसून वर्षा, दक्षिण चीन सागर और प्रशांत महासागर के ऊपर आउटगोइंग लॉन्ग वेव रेडिएशन, तथा हिंद महासागर क्षेत्र में निचले क्षोभमंडलीय पवन प्रवाह शामिल हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि मानसून समय से पहले सक्रिय होता है तो इससे खरीफ फसलों की बुवाई जल्दी शुरू हो सकती है। विशेष रूप से धान, मक्का, सोयाबीन और दालों की खेती को लाभ मिल सकता है। वहीं अत्यधिक या असामान्य वर्षा की स्थिति में बाढ़, भूस्खलन और फसलों को नुकसान का खतरा भी बढ़ जाता है।
उत्तराखंड जैसे पर्वतीय राज्यों के लिए भी मानसून की समयपूर्व सक्रियता महत्वपूर्ण मानी जा रही है। मौसम वैज्ञानिकों के अनुसार मई के अंतिम सप्ताह और जून के प्रारंभ में प्री-मानसून गतिविधियों के तेज होने से पहाड़ी क्षेत्रों में गर्जन, तेज हवाएं और ओलावृष्टि की घटनाएं बढ़ सकती हैं। चारधाम यात्रा मार्गों पर प्रशासन पहले से सतर्कता बढ़ा रहा है।
