हिंदी पत्रकारिता दिवस पर विशेष : अखबार के लिए मानक क्यों नहीं ?
–अरुण श्रीवास्तव-
आयेदिन अखबारों में खबरें छपतीं हैं कि एक शिक्षक के सहारे चल रहा स्कूल, अमूमन सभी प्रदेशों में विभागीय व्यवस्था के तहत एकल स्कूल भी हैं या महीनों से फलां पद का टीचर नहीं, सफाई कर्मचारी नहीं, खुद को देवभूमि कहने वाले उत्तराखंड में तो दर्जनों नहीं सैकड़ों पद खाली हैं विद्यालय के मुखिया यानी प्रधानाचार्य की। राष्ट्रीय स्तर पर सभी स्कूल कालेजों में साइंस का विषय है पर सैकड़ों में लैब नहीं। इसी तरह अस्पतालों में मशीनें नहीं, लैब नहीं, सब कुछ है तो डाक्टर नहीं। आयेदिन सुनने/पढ़ने को मिलता है कि फार्मासिस्ट के भरोसे चल रहा हास्पिटल या शिक्षा मित्र चला रहे स्कूल।
क्या कभी इस तरह के समाचार पढ़ने को मिलें हैं कि बिना संपादक के निकाल रहा अखबार? बिना कैमरामैन के खबरिया चैनलों में हो रही रिपोर्टिंग। आमतौर पर रिपोर्टिंग करने वाले ही पकड़े रहते हैं माइक। ऐसा नहीं कि उक्त पद सृजित नहीं हैं। स्कूलों के लिए मानक है कि, इतना बड़ा कमरा होना चाहिए, लैब होना चाहिए,खेल का मैदान होना चाहिए तो अस्पताल के लिए ऑपरेशन थियेटर होना चाहिए और उसमें फलां फलां सुविधाएं भी, बहुमंजिला इमारत है तो लिफ्ट होनी चाहिए पर स्कूल कालेज के लिए कोई घोषित मानक नहीं अगर है तो शायद ही किसी को पता हो। पर अखबार के लिए कोई मानक नहीं। यानी ‘खुला खेल फारुख्खाबादी’। न कर्मचारी का मानक, पद का चाहे अखबार छोटा,बड़ा या मझोला हो। शहरी हो या ग्रामीण। चाहे दो पेज़ का हो दो सौ(अपवाद ही सही) पेज़ का। कितने पृष्ठ के अखबार में कितने उप संपादक, वरिष्ठ उप संपादक, मुख्य उप संपादक, डिप्टी न्यूज एडिटर, न्यूज एडिटर होने चाहिए। स्थानीय संपादक बहुसंस्करण के लिए जरूरी है या एकल के लिए। एक शहर से एक ही नाम से अखबार निकलता है पर प्रिंट लाइन में समूह संपादक का नाम जाता है। अखबारो़ का समूह है नहीं फिर भी समूह संपादक को अस्तित्व है।
शायद इसे भी कहते हैं “चिराग तले अंधेरा” पर ये अंधेरा कब तक रहेगा ?
सवाल ये भी है कि अस्पताल या नर्सिंग होम खोलने के लिए मानक तय है तो अखबार के लिए क्यों नहीं ? अस्पताल के रजिट्रेशन के एमसीआई और स्कूल के लिए डीआईओएस तो डिग्री कालेज के यूजीसी के नार्मस हैं अखबार या चैनल के लिए क्यों नहीं। स्कूल के लिए कमरे व प्रयोगशाला का आकार तय है क्लास रूम में छात्रों और शिक्षकों का पीरियड भी। अनुपात तक तय है। रोडवेज में बस और कर्मचारी का अनुपात, नए थाना खोलने का मानक है लेकिन विश्व गुरु बनने के मुहाने पर खड़े अपने देश भारत में अखबारों और चैनलों के लिए कोई मानक नहीं है तो क्यों? क्या ये छुटवा सांड हैं?
आधुनिकीकरण ने किया बेड़ा गर्क : स्कूली दिनों में एक निबंध पढ़ा था,
‘विज्ञान वरदान भी अभिशाप भी। विज्ञान की देन है मशीनें। मानव ने मशीनों का इस मशीनीकरण इस विध्वंशकारी तरीके से किया की उसके दुष्परिणाम सामने आने लगे हैं। 80 दशक के अंत में अखबारी दुनिया में लाख विरोध के बावजूद कंप्यूटर अपनी दख़ल बनाने में कामयाब रहा। पहले ग्रामीण संवाददाताओं की ख़बरों को डेस्क पर विराजमान प्राणी खबर का रूप देता था। तब का पीटीएस (अब का डीटीपी) विभाग टाइप करता था और प्रूफ करेक्शन के बाद पेस्टर सादे कागज पर चस्पा करता था। 90 के दशक के अंत में प्रूफ और पेस्टिंग जैसे भारी-भरकम विभाग को डेस्क निगल गया। अब डेस्क पर विराजमान उप संपादक खबरें बनाता है, खाली पेज़ पर विज्ञापन चिपकाता है और अपने बनाए खबर की विज्ञापन की साइज़ के हिसाब से हत्या भी करता है। तो क्या ख़बरों का हत्यारा है विज्ञापन? इस पर बात फिर कभी। इस मशीनीकरण से फायदा हुआ मालिक का और नुकसान अखबारकर्मियों का।
खाज़ में कोढ़ बने पत्रकारिता संस्थान: एक समय था जब अखबार खबरों का भरोसेमंद माध्यम होता था और खबरनबीश जरिया। आज़ अखबार धंधा बन गया है और डेस्क पर बैठा पत्रकार बाबू और फील्ड वाला दलाल। तब जान पहचान और योग्यता के आधार पर का मिलता था। आज़ हर मीडिया घराने ने अपना प्रशिक्षण संस्थान खोल रखा है और हर बड़े शहर में डिग्री-डिप्लोमा देने वाले संस्थान। हर साल थोक में इतने पत्रकार “उगल” रहे हैं जितनी जरूरत ही नहीं। अब देहरादून से ही हर साल लगभग दर्जनों छात्र पत्रकारिता में डिग्री/डिप्लोमा लेकर निकलते हैं, अखबार हैं चार पांच और चैनल भी इतने ही और सबका मुख्यालय दिल्ली है। अब सवाल ये उठता है कि इतने खपेंगे कहां?
और अंत में
“खुदा के घर से कुछ पत्रकार फरार हो गए।
कुछ पकड़े गए, बाकी पत्रकार हो गए।
