चारधाम यात्रा : आखिर व्यवस्था क्यों हो रही है अनियंत्रित?
— प्रकाश कपरुवाण-
ज्योतिर्मठ, 29 मई। इस वर्ष चारधाम यात्रा लगातार अव्यवस्थाओं और भारी दबाव के कारण चर्चा में है। प्रश्न यह उठ रहा है कि आखिर केदारनाथ और बद्रीनाथ धाम पहुंचने वाले सभी श्रद्धालुओं को क्या वास्तव में सुगम और सुलभ दर्शन मिल पा रहे हैं? ऑल वेदर रोड और सड़क चौड़ीकरण जैसी महत्वाकांक्षी परियोजनाओं के बावजूद यात्री घंटों जाम में फंसने को क्यों मजबूर हैं? कपाट खुलने के लगभग एक माह बाद भी यात्रा व्यवस्था पूरी तरह पटरी पर क्यों नहीं लौट पाई है?
मैदानी क्षेत्रों में भीषण गर्मी पड़ने के साथ ही बड़ी संख्या में श्रद्धालु और पर्यटक पर्वतीय क्षेत्रों की ओर रुख कर रहे हैं। तीर्थाटन के साथ-साथ पर्यटन और सोशल मीडिया रील बनाने के शौकीनों की भी भारी भीड़ यात्रा मार्गों पर दिखाई दे रही है। दूसरी ओर प्रशासन, पुलिस और विभिन्न विभाग व्यवस्था संभालने के लिए दिन-रात जुटे हुए हैं। पुलिस प्रशासन की सहायता के लिए अर्द्धसैनिक बलों तक की तैनाती की गई है, इसके बावजूद यात्रा मार्गों पर बार-बार जाम की स्थिति उत्पन्न हो रही है और यात्रियों को भारी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है।
इन समस्याओं के पीछे एक बड़ा कारण धामों की क्षमता के विपरीत श्रद्धालुओं की संख्या को लगभग असीमित कर देना भी माना जा रहा है। इसका खामियाजा केवल तीर्थयात्रियों को ही नहीं, बल्कि यात्रा व्यवस्था में लगे विभागों और स्थानीय व्यवसायियों को भी भुगतना पड़ रहा है।
दरअसल, गत वर्षों तक चारधामों में उपलब्ध व्यवस्थाओं और क्षमता के अनुरूप सीमित संख्या में श्रद्धालुओं को भेजा जाता था, ताकि यात्रियों को बेहतर सुविधाएं और सुचारु दर्शन व्यवस्था मिल सके। हालांकि, यात्रा पर निर्भर व्यापारियों और स्थानीय व्यवसायियों ने सीमित संख्या की बाध्यता का विरोध किया। आंदोलन भी हुए और सरकार पर दबाव बनाया गया। अंततः सरकार ने श्रद्धालुओं की संख्या पर लगी सीमा समाप्त करने का निर्णय ले लिया।
इसके बाद हालात तेजी से बदल गए। विशेषकर श्री केदारनाथ और बद्रीनाथ धाम में प्रतिदिन 15 हजार से 30 हजार तक श्रद्धालु पहुंच रहे हैं। जबकि वहां आवासीय क्षमता सीमित है, पार्किंग व्यवस्था सीमित है और दर्शन स्थलों की क्षमता भी तय है। ऐसे में असीमित संख्या में यात्रियों का पहुंचना स्वाभाविक रूप से अव्यवस्था को जन्म दे रहा है।
स्थिति इतनी गंभीर हो चुकी है कि कई श्रद्धालुओं को केदारनाथ धाम से बिना दर्शन किए ही वापस लौटना पड़ रहा है। यात्रा मार्गों पर देर रात तक लगने वाले जाम के कारण यात्री अपने अग्रिम बुकिंग वाले होटलों तक भी समय पर नहीं पहुंच पा रहे हैं। कई स्थानों पर रात दो-दो बजे तक वाहन रेंगते नजर आ रहे हैं।
इन परिस्थितियों में लाभ और हानि का अलग-अलग आकलन हो सकता है, लेकिन सबसे अधिक पीड़ा उस श्रद्धालु को झेलनी पड़ रही है, जो वर्षों से मन में आस्था और दर्शन की कामना लेकर धामों तक पहुंचता है। विडंबना यह है कि चारधाम यात्रा की तैयारियां हर वर्ष जनवरी माह से ही शुरू हो जाती हैं और शासन-प्रशासन द्वारा “चाक-चौबंद व्यवस्थाओं” के दावे भी किए जाते हैं। इसके बावजूद इस बार व्यवस्थाएं धरातल पर बिखरी हुई दिखाई दे रही हैं।
यह भी महत्वपूर्ण है कि शासन और प्रशासन के पास न केवल चारों धामों, बल्कि यात्रा मार्ग के सभी प्रमुख पड़ावों की आवास क्षमता, पार्किंग व्यवस्था, होटल, ढाबों और रेस्टोरेंट आदि का पूरा विवरण उपलब्ध रहता है। इसके बावजूद यदि क्षमता से अधिक यात्रियों को धामों की ओर जाने दिया जा रहा है, तो अव्यवस्था होना स्वाभाविक है।
चारधाम यात्रा केवल पर्यटन नहीं, बल्कि करोड़ों लोगों की आस्था से जुड़ा विषय है। इसलिए आवश्यक है कि सरकार और प्रशासन यात्रियों की संख्या, व्यवस्थाओं की क्षमता और सुरक्षा के बीच संतुलन स्थापित करें। देवभूमि उत्तराखंड की “अतिथि देवो भवः” की परंपरा तभी सार्थक मानी जाएगी, जब यहां आने वाला श्रद्धालु सुखद अनुभव और संतोष के साथ लौटे।
सरकारें जनता के हितों के प्रति जवाबदेह अवश्य होती हैं, लेकिन किसी भी निर्णय से पहले उसके दूरगामी परिणामों का गंभीर आकलन और समीक्षा भी उतनी ही आवश्यक है।
